रक्षाबंधन: रक्षा-सूत्र का दिन
रक्षाबंधन श्रावण पूर्णिमा को होता है। धर्मसिंधु के अनुसार राखी भद्रा-रहित पूर्णिमा में, अपराह्न या प्रदोष के समय बाँधी जाती है; अगर पूर्णिमा सूर्योदय के बाद तीन मुहूर्त से कम हो, तो पिछले दिन के भद्रा-रहित प्रदोष में।
रक्षा-सूत्र बाँधने का दिन: बहन-भाई का त्योहार, और पुरोहित द्वारा यजमान को रक्षा बाँधने की पुरानी रीति भी।
रक्षाबंधन क्या है
रक्षाबंधन ‘रक्षा का बंधन’ है: एक धागा जो किसी की कलाई पर उसकी कुशलता की प्रार्थना के साथ बाँधा जाता है। आज यह मुख्यतः बहन-भाई का त्योहार है: बहन भाई को राखी बाँधती है, तिलक करती है, मिठाई खिलाती है; भाई उपहार देता है और साथ निभाने का वचन।
पुरानी रीति में यह धागा पुरोहित अपने यजमानों को और राज-पुरोहित राजा को बाँधते थे। इसी पूर्णिमा को ब्राह्मण परिवारों में श्रावणी उपाकर्म होता है, जिसमें यज्ञोपवीत बदला जाता है; दक्षिण में इसे ‘अवनि अवित्तम्’ कहते हैं।
तारीख कैसे तय होती है
शास्त्र (धर्मसिंधु): रक्षाबंधन उस पूर्णिमा में जो
- भद्रा-रहित हो,
- सूर्योदय के बाद तीन मुहूर्त से अधिक रहे, और
- बंधन अपराह्न या प्रदोष में हो।
अगर पूर्णिमा सूर्योदय के बाद तीन मुहूर्त से कम हो, तो पिछले दिन भद्रा-रहित प्रदोष आदि काल में। धर्मसिंधु यह भी कहता है कि ग्रहण या संक्रांति के दिन भी रक्षाबंधन किया जाए।
भद्रा क्या है: भद्रा विष्टि करण का नाम है, लगभग आधी तिथि का समय। पूर्णिमा का पहला आधा अक्सर भद्रा में होता है, इसलिए कई साल सुबह भद्रा रहती है और राखी दोपहर बाद बाँधी जाती है। भद्रा को बस टाला जाता है, डरने की बात नहीं। (देखें: करण का पेज।)
कथा: परंपरा / पुराण कथा
राजा बलि का मंत्र: धर्मसिंधु राखी बाँधते समय यह मंत्र देता है: “येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥” अर्थ: जिस (धर्म के) बंधन से महाबली दानवराज बलि बँधे थे, उसी से मैं तुम्हें बाँधता/बाँधती हूँ; हे रक्षा, तुम स्थिर रहो।
परंपरा की कथाएँ: एक कथा में देवासुर युद्ध के समय इंद्राणी शची ने इंद्र की कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधा। दूसरी में लक्ष्मी ने राजा बलि को राखी बाँधकर उनसे विष्णु को वापस माँगा। लोक-कथा में द्रौपदी ने कृष्ण की कटी उँगली पर अपनी साड़ी का टुकड़ा बाँधा था, और कृष्ण ने उसका मान रखा।
धर्मसिंधु के अनुसार इसी पूर्णिमा को भगवान हयग्रीव का प्राकट्य भी हुआ।
परिवार कैसे मनाते हैं
उत्तर और पश्चिम भारत में घर-घर राखी, मिठाई और भाई-बहन का मिलना; दूर रहने वाले भाइयों को राखी डाक से जाती है। महाराष्ट्र और तटीय क्षेत्रों में इसी दिन नारळी पूर्णिमा: मछुआरे समुद्र को नारियल अर्पित करते हैं। उत्तराखंड में ‘जनेऊ पुन्यू’। कई जगह बहनें सैनिकों, पेड़ों या अपने मित्रों को भी राखी बाँधती हैं; यह रक्षा का भाव सबके लिए है।
सरल विधि
- थाली सजाएँ: रोली, अक्षत, दीया, राखी और मिठाई।
- भाई को पूर्व की ओर मुँह करके बिठाएँ, सिर पर रूमाल या कपड़ा।
- तिलक और अक्षत, फिर दाहिनी कलाई पर राखी बाँधते हुए ‘येन बद्धो बली राजा…’ मंत्र या मन की प्रार्थना।
- आरती और मिठाई; भाई अपनी सामर्थ्य से उपहार देता है।
कोई पैसे वाली पूजा ज़रूरी नहीं। भद्रा न हो, बस इतना ध्यान रखें।
सुरक्षा
त्योहार पर यात्रा और बाज़ारों में भीड़ रहती है; बच्चों और सामान का ध्यान रखें। मिठाइयों में मिलावट का डर रहता है; भरोसेमंद दुकान या घर की बनी मिठाई अच्छी है। डायबिटीज़ वाले लोग मीठे का संतुलन रखें। सजावटी राखियों में प्लास्टिक कम हो तो अच्छा; छोटे बच्चों के मुँह में छोटे मोती-बटन न जाएँ।
ePandit में
ePandit में: त्योहार का दिन हमारा कैलेंडर आपके शहर के सूर्योदय-सूर्यास्त से दिखाता है। दिन एक बार उज्जैन के हिसाब से तय होता है, आपके शहर का समय अलग दिखता है। हम अभी मुहूर्त नहीं निकालते, और किसी त्योहार को किसी के लिए अच्छा या बुरा नहीं बताते।
यात्रा और भीड़ में सावधानी; मिठाई में मिलावट से बचें, घर की बनी चीज़ें अच्छी हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
भद्रा क्यों देखी जाती है?
धर्मसिंधु भद्रा-रहित पूर्णिमा में रक्षाबंधन कहता है। भद्रा विष्टि करण का नाम है; इसे बस टाला जाता है, इसमें डरने की कोई बात नहीं।
सुबह राखी बाँध सकते हैं?
ग्रंथ अपराह्न या प्रदोष कहता है। बहुत से परिवार भद्रा न हो तो अपनी सुविधा से दिन में बाँधते हैं।
पूर्णिमा दो दिन हो तो?
अगर दूसरे दिन पूर्णिमा सूर्योदय के बाद तीन मुहूर्त से अधिक है तो दूसरे दिन, भद्रा-रहित अपराह्न या प्रदोष में; नहीं तो पहले दिन, भद्रा-रहित प्रदोष में।
इसी दिन और क्या?
श्रावणी उपाकर्म (यज्ञोपवीत बदलना), नारळी पूर्णिमा, और धर्मसिंधु के अनुसार हयग्रीव का प्राकट्य-दिन।
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