पूर्णिमा: महीने का पूरा चाँद
पूर्णिमा हर शुक्ल पक्ष की पंद्रहवीं तिथि है, जब चाँद पूरा दिखता है। धर्मसिंधु के अनुसार स्नान-दान आदि के लिए पूर्णिमा ‘परली’ ली जाती है, यानी वह दिन जिसके सूर्योदय पर पूर्णिमा हो (सावित्री व्रत अपवाद है)। पूर्णिमा व्रत और सत्यनारायण कथा परंपरा में उस दिन रखी जाती है जिसकी शाम चंद्रोदय पर पूर्णिमा हो, इसलिए कभी दो दिन दिखते हैं।
हर महीने का पूर्ण चंद्र: स्नान, दान, सत्यनारायण कथा।
पूर्णिमा क्या है
चंद्र मास के शुक्ल पक्ष की आखिरी, पंद्रहवीं तिथि पूर्णिमा है। इस समय सूर्य और चंद्रमा आमने-सामने होते हैं और चाँद पूरा, गोल दिखता है। साल में 12 पूर्णिमाएँ होती हैं, अधिक मास वाले साल में 13। जिन पंचांगों में महीना पूर्णिमा पर पूरा होता है (पूर्णिमांत), उनमें महीने का नाम भी पूर्णिमा से जुड़ा है: जैसे चित्रा नक्षत्र के पास की पूर्णिमा वाला महीना चैत्र।
मुहूर्त-चिंतामणि के अनुसार पूर्णिमा के स्वामी चंद्रमा हैं, और पूर्णिमा ‘पूर्णा’ (भरी हुई) तिथियों में गिनी जाती है। परंपरा इसे स्नान, दान, सत्यनारायण कथा और चंद्रमा को अर्घ्य देने का दिन मानती है।
दिन कैसे तय होता है: दो काम, दो नियम
पूर्णिमा तिथि अक्सर एक दिन दोपहर या शाम से अगले दिन दोपहर या शाम तक चलती है। इसलिए दो अलग कामों के लिए दो अलग दिन हो सकते हैं:
1. स्नान-दान (शास्त्र, धर्मसिंधु): पूर्णिमा और अमावस्या, सावित्री व्रत को छोड़कर, ‘परली’ ली जाती हैं: यानी वह दिन जिसके सूर्योदय पर पूर्णिमा हो। धर्मसिंधु यह भी कहता है कि ‘सब पूर्णिमा पहले दिन लो’ वाली बात का कोई ठोस आधार नहीं मिलता; केवल कुछ खास पर्वों (जैसे श्रावणी और होलिका) के अपने अलग नियम हैं।
2. पूर्णिमा व्रत और सत्यनारायण (परंपरा): व्रत में चाँद को अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है, इसलिए परंपरा वह दिन लेती है जिसकी शाम चंद्रोदय के समय पूर्णिमा हो। यह नियम हमारे पुस्तकालय के ग्रंथों में नहीं मिला, इसलिए हम इसे परंपरा कहते हैं।
| काम | दिन |
|---|---|
| स्नान, दान, तीर्थ | सूर्योदय पर पूर्णिमा वाला (परला) दिन |
| व्रत, सत्यनारायण, चंद्र-अर्घ्य | चंद्रोदय पर पूर्णिमा वाला दिन |
जब ये दोनों अलग हों, हमारा कैलेंडर दोनों दिन अलग-अलग दिखाता है। गुरु पूर्णिमा, शरद पूर्णिमा जैसे पर्वों के अपने नियम हैं, जो उनके पेज पर हैं।
साल की प्रसिद्ध पूर्णिमाएँ (परंपरा)
हर पूर्णिमा किसी न किसी पर्व से जुड़ी है; रीति क्षेत्र के हिसाब से बदलती है:
| महीना | पर्व |
|---|---|
| चैत्र | हनुमान जयंती (कई क्षेत्रों में) |
| वैशाख | बुद्ध पूर्णिमा |
| ज्येष्ठ | वट पूर्णिमा (महाराष्ट्र, गुजरात), देव स्नान (पुरी) |
| आषाढ़ | गुरु पूर्णिमा (व्यास पूजा) |
| श्रावण | रक्षा बंधन, श्रावणी, नारली पूर्णिमा |
| भाद्रपद | उमा-महेश्वर व्रत; अगले दिन से पितृ पक्ष |
| आश्विन | शरद पूर्णिमा (कोजागरी) |
| कार्तिक | कार्तिक पूर्णिमा, देव दीपावली, गुरु नानक जयंती |
| मार्गशीर्ष | दत्तात्रेय जयंती |
| पौष | शाकंभरी पूर्णिमा |
| माघ | माघी पूर्णिमा, माघ-स्नान का समापन |
| फाल्गुन | होलिका दहन |
शास्त्र (धर्मसिंधु): मार्गशीर्ष की पूर्णिमा को दत्तात्रेय का जन्म बताया गया है, और उसके लिए प्रदोष (शाम) में रहने वाली पूर्णिमा ली जाती है। यानी हर पर्व का अपना समय-नियम हो सकता है।
परिवार कैसे मनाते हैं
बहुत-से घरों में हर पूर्णिमा पर सत्यनारायण कथा होती है: केले के पत्तों से सजी चौकी, पंचामृत, पंजीरी या शीरा का प्रसाद, और कथा के बाद परिवार-पड़ोसियों में प्रसाद बाँटना। कई लोग पूर्णिमा पर नदी-स्नान करते हैं, कोई तीर्थ जाता है, कोई बस सुबह किसी ज़रूरतमंद को भोजन देता है। शाम को चाँद को जल का अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है।
बौद्ध परंपरा में पूर्णिमा (उपोसथ) ध्यान और उपदेश का दिन है, और जैन परंपरा में भी कई पूर्णिमाएँ विशेष हैं। रीतियाँ घर-घर अलग हैं, और यह सहज है।
सरल पूजा
- सुबह स्नान; हो सके तो किसी ज़रूरतमंद को अन्न, पानी या कपड़े।
- पूजा-स्थान पर विष्णु या अपने इष्ट का चित्र, दीया, फूल, तुलसी।
- शाम को सत्यनारायण कथा पढ़ें या सुनें, या केवल विष्णु-नाम का स्मरण।
- चाँद निकलने पर एक लोटे से जल का अर्घ्य, और कुछ पल शांत बैठकर चाँद को देखना।
- प्रसाद सबके साथ बाँटें।
कथा घर पर खुद पढ़ना भी पूरा है; पैसे देकर कुछ करवाने की ज़रूरत नहीं।
सेहत और सुरक्षा
उपवास और सेहत: पूर्णिमा व्रत अपनी सेहत के हिसाब से रखें। डायबिटीज़, ब्लड प्रेशर, गर्भावस्था, स्तनपान, बुज़ुर्ग उम्र, तबीयत ठीक न हो या नियमित दवा चलती हो, तो फल, दूध या एक समय के सादे भोजन वाला हल्का रूप चुनें, या पहले डॉक्टर से पूछ लें। दवा का समय न बदलें। सेहत के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा है; कोई व्रत इसकी जगह नहीं लेता। निर्जला व्रत की ज़रूरत नहीं।
पूर्णिमा कोई डरने का दिन नहीं; यह एक सामान्य दिन है जिसे परंपरा स्नान, दान और शांति के लिए अच्छा मानती है। नदी-स्नान करें तो तय घाटों पर, तेज़ धारा से दूर, बच्चों पर नज़र रखें, और नदी में प्लास्टिक या पूजा का बचा सामान न डालें। पंचामृत और प्रसाद गर्मी में जल्दी खराब हो सकते हैं; उसी दिन बाँट दें।
ePandit में
ePandit में: पूर्णिमा का दिन हमारा कैलेंडर आपके शहर के सूर्योदय-सूर्यास्त और चंद्रोदय से दिखाता है। दिन एक बार उज्जैन के हिसाब से तय होता है; जब स्नान-दान और व्रत के दिन अलग हों, तो दोनों अलग-अलग दिखते हैं। हम अभी मुहूर्त नहीं निकालते, और किसी दिन को किसी के लिए अच्छा या बुरा नहीं बताते।
उपवास अपनी सेहत के हिसाब से रखें। डायबिटीज़, गर्भावस्था, बुज़ुर्ग या नियमित दवा लेने वाले लोग फल, दूध या एक समय के भोजन वाला हल्का रूप चुन सकते हैं; सेहत के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
पूर्णिमा दो दिन क्यों दिखती है?
तिथि एक दिन से अगले दिन तक चलती है। स्नान-दान के लिए सूर्योदय पर पूर्णिमा वाला दिन (धर्मसिंधु) और व्रत के लिए चंद्रोदय पर पूर्णिमा वाला दिन (परंपरा) लिया जाता है; ये कभी अलग होते हैं।
सत्यनारायण कथा किस दिन करें?
परंपरा में उस दिन, जिसकी शाम चंद्रोदय पर पूर्णिमा हो। घर पर खुद पढ़ना भी पूरा है।
क्या पूर्णिमा पर कुछ टालना चाहिए?
नहीं, यह सामान्य दिन है। परंपरा इसे स्नान, दान और शांत मन से पूजा के लिए अच्छा मानती है।
व्रत न रख सकें तो?
दान, कथा और चाँद को अर्घ्य भी परंपरा का हिस्सा है। तबीयत ठीक न हो, गर्भावस्था, डायबिटीज़ या दवा हो तो हल्का रूप चुनें या डॉक्टर से पूछें।
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आधार: धर्मसिंधु, पूर्णिमा-अमावस्या-निर्णय, सावित्री व्रत को छोड़कर परली · धर्मसिंधु, पूर्णिमा-अमावस्या-निर्णय (भाषा-टीका), पूर्णिमा और अमावस्या परली लें · धर्मसिंधु, पूर्णिमा-अमावस्या-निर्णय (भाषा-टीका), सब पूर्णिमा पहले दिन लेने के मत का मूल नहीं मिलता · धर्मसिंधु, मार्गशीर्ष: दत्त-जयंती (भाषा-टीका), मार्गशीर्ष पूर्णिमा, प्रदोष-व्यापिनी · मुहूर्त-चिंतामणि, शुभाशुभ-प्रकरण 3, टीका (तिथियों के स्वामी), पूर्णिमा के चंद्रमा · मुहूर्त-चिंतामणि, शुभाशुभ-प्रकरण 4, टीका (नंदा आदि तिथि-संज्ञा), पूर्णिमा पूर्णा तिथि · परंपरा, व्रत और सत्यनारायण के लिए चंद्रोदय वाला दिन; साल की पूर्णिमाओं के पर्व; सत्यनारायण कथा की रीति