नरक चतुर्दशी: भोर का स्नान, शाम के दीये
नरक चतुर्दशी, जिसे छोटी दिवाली, रूप चौदस या काली चौदस भी कहते हैं, कार्तिक (अमांत आश्विन) की कृष्ण चतुर्दशी है। धर्मसिंधु के अनुसार इस दिन भोर में तेल और उबटन से स्नान (अभ्यंग स्नान) होता है, और वह दिन लिया जाता है जब चंद्रोदय के समय, यानी सूर्योदय से कुछ पहले, चतुर्दशी हो। शाम को घर, मंदिर और गलियों में दीये जलते हैं।
भोर में तेल-उबटन से स्नान और शाम को दीये; दिवाली से पहले की सुबह।
नरक चतुर्दशी क्या है
दिवाली के पाँच दिनों में यह दूसरा दिन है: धनतेरस, फिर नरक चतुर्दशी, फिर अमावस्या की लक्ष्मी पूजा, फिर गोवर्धन पूजा और भाई दूज। इसकी पहचान है भोर का अभ्यंग स्नान: तिल के तेल की मालिश, उबटन, और फिर स्नान। शाम को घर के बाहर और आसपास दीये।
नाम जगह के हिसाब से बदलते हैं। उत्तर भारत में इसे छोटी दिवाली कहते हैं; राजस्थान और गुजरात में रूप चौदस या काली चौदस। महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक और तमिलनाडु में यही सुबह दीपावली का बड़ा स्नान है; तमिलनाडु में दीपावली मुख्य रूप से इसी भोर मनाई जाती है। बंगाल में इसे भूत चतुर्दशी कहते हैं, जहाँ चौदह दीये जलाने की रीति है। कुछ जगह इसी दिन हनुमान जयंती भी मनाई जाती है। रीति अलग है, भाव एक: अंधेरे के बाद उजाले का स्वागत।
दिन कैसे तय होता है
शास्त्र (धर्मसिंधु): आश्विन (पूर्णिमांत कार्तिक) की कृष्ण चतुर्दशी, जो चंद्रोदय-व्यापिनी हो, उसमें अभ्यंग स्नान होता है। कृष्ण पक्ष के अंत में चाँद सूर्योदय से कुछ ही पहले उगता है, इसलिए यह भोर का नियम है।
धर्मसिंधु भोर के तीन हिस्से बताता है: रात के आखिरी प्रहर से अरुणोदय तक, अरुणोदय से चंद्रोदय तक, और चंद्रोदय से सूर्योदय तक। इनमें बाद वाला हिस्सा बेहतर माना गया है, यानी चंद्रोदय के बाद का समय मुख्य है।
| चंद्रोदय के समय चतुर्दशी | दिन |
|---|---|
| केवल पहले दिन | पहला |
| केवल दूसरे दिन | दूसरा |
| दोनों दिन | पहला |
| किसी दिन नहीं | धर्मसिंधु के उप-नियम |
किसी दिन चंद्रोदय पर चतुर्दशी न हो, ऐसी बारीक स्थितियों के लिए ग्रंथ अलग उप-नियम देता है; हमारा कैलेंडर उन्हीं से दिन चुनता है। ग्रंथ यह भी कहता है कि बताए समय में स्नान न हो सके तो सूर्योदय के बाद गौण समय में भी कर लें।
कभी-कभी नरक चतुर्दशी और दिवाली एक ही दिन पड़ती हैं: भोर में चतुर्दशी हो और दिन में अमावस्या लग जाए, तो सुबह का स्नान और शाम की लक्ष्मी पूजा एक ही तारीख पर आ जाते हैं।
कथा: परंपरा / पुराण कथा
परंपरा इस दिन को श्रीकृष्ण की नरकासुर पर विजय से जोड़ती है। कथा है कि नरकासुर ने बहुत से लोगों को बंदी बना रखा था; श्रीकृष्ण ने (कई कथाओं में सत्यभामा के साथ) उसे हराया और बंदियों को मुक्त किया, और लोगों ने दीये जलाकर खुशी मनाई। गोवा में भोर से पहले नरकासुर के कागज़ के पुतले जलाए जाते हैं, और महाराष्ट्र में स्नान के बाद एक कड़वा छोटा फल पैर से फोड़ने की रीति है, उसी जीत की याद में।
‘रूप चौदस’ नाम के पीछे लोक मान्यता है कि उबटन और स्नान से तन-मन निखरता है। नाम में ‘नरक’ शब्द है, पर यह डर का दिन नहीं: यह बुराई पर अच्छाई की जीत और साफ़-सुथरी नई शुरुआत का दिन है। इन कथाओं को हम परंपरा के रूप में रखते हैं; ये हमारी लाइब्रेरी के ग्रंथों में नहीं मिलीं।
परिवार कैसे मनाते हैं
भोर में घर के बड़े बच्चों को तिल का तेल लगाते हैं, बेसन-हल्दी या घर का उबटन मलते हैं, फिर गुनगुने पानी से स्नान। नए या साफ़ कपड़े, तिलक, घर के देवता को प्रणाम, और कई घरों में मिठाई और नाश्ते की थाली।
शास्त्र (धर्मसिंधु): ग्रंथ स्नान के बीच अपामार्ग (चिरचिटा) आदि की टहनी को सिर के ऊपर तीन बार घुमाने की पुरानी रीति बताता है, और स्नान के बाद तिल-मिले जल से यमराज के नाम तर्पण। आज बहुत से परिवार ये रीतियाँ नहीं करते; अपनी कुल-रीति से चुनें।
शास्त्र (धर्मसिंधु): शाम को प्रदोष के समय मंदिर, मठ, बगीचे, गली और पशुशाला में सुंदर दीये लगाने को कहा है, और यही दीपदान तीनों दिन (चतुर्दशी, अमावस्या, प्रतिपदा)। उत्तर भारत के कई घरों में घर के बाहर दक्षिण की ओर एक दीया ‘यम का दीया’ कहकर रखा जाता है; यह परंपरा है।
सरल विधि
- रात को उबटन और तिल का तेल तैयार रखें; सुबह के लिए गुनगुना पानी।
- भोर में (हो सके तो सूर्योदय से पहले) तेल-मालिश और उबटन, फिर स्नान।
- साफ़ कपड़े, तिलक, घर के देवता और बड़ों को प्रणाम।
- शाम को दरवाज़े, आँगन, तुलसी और पूजा-स्थान पर दीये।
- चाहें तो श्रीकृष्ण या हनुमान जी का स्मरण, परिवार के साथ भोजन।
कोई पैसे वाली पूजा ज़रूरी नहीं।
सेहत और सुरक्षा
ठंडी सुबह: गुनगुना पानी लें। बुज़ुर्ग, बीमार और छोटे बच्चे अपनी सुविधा से थोड़ा देर से भी नहा सकते हैं; ग्रंथ भी सूर्योदय के बाद गौण समय मानता है। तेल लगाने के बाद बाथरूम का फ़र्श फिसलन भरा हो जाता है, बुज़ुर्गों का हाथ थामें। किसी को उबटन से त्वचा पर जलन होती हो तो पहले थोड़ा लगाकर देखें।
दीये और पटाखे: दीयों को परदों, कपड़ों और सूखी पत्तियों से दूर रखें, बच्चों के पास बड़ा व्यक्ति रहे, और पास में पानी या रेत की बाल्टी रखें। पटाखे चलाएँ तो सूती कपड़े पहनें, खुली जगह चुनें, और बुज़ुर्गों, दमा वाले लोगों और पालतू या गली के जानवरों का ध्यान रखें। जलने पर ठंडा बहता पानी डालें और डॉक्टर को दिखाएँ।
इस दिन आमतौर पर व्रत नहीं होता। कोई रखे तो बीमार, गर्भवती, डायबिटीज़ वाले या दवा लेने वाले लोग हल्का रूप लें या डॉक्टर से पूछ लें।
ePandit में
ePandit में: त्योहार का दिन हमारा कैलेंडर आपके शहर के सूर्योदय-सूर्यास्त से दिखाता है। दिन एक बार उज्जैन के हिसाब से तय होता है, आपके शहर का समय अलग दिखता है। हम अभी मुहूर्त नहीं निकालते, और किसी त्योहार को किसी के लिए अच्छा या बुरा नहीं बताते।
ठंडी सुबह में गुनगुना पानी लें; बुज़ुर्ग और छोटे बच्चे अपनी सुविधा से स्नान करें। दीयों को परदों और कपड़ों से दूर रखें, बच्चों के पास बड़ा व्यक्ति रहे, और पास में पानी या रेत की बाल्टी रखें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
इसे छोटी दिवाली क्यों कहते हैं?
यह दीपावली के तीन मुख्य दिनों (चतुर्दशी, अमावस्या, प्रतिपदा) में पहला है; धर्मसिंधु तीनों दिन दीपदान कहता है।
कभी यह दिवाली के दिन ही क्यों पड़ती है?
स्नान भोर में होता है और लक्ष्मी पूजा शाम को। अगर भोर में चतुर्दशी हो और दिन में अमावस्या लग जाए, तो दोनों एक ही दिन पड़ते हैं।
सूर्योदय से पहले न नहा सकें तो?
धर्मसिंधु कहता है कि बताए समय में न हो सके तो सूर्योदय के बाद गौण समय में भी स्नान कर लें। सेहत पहले।
नाम में ‘नरक’ है, क्या यह डरने का दिन है?
नहीं। परंपरा इसे नरकासुर पर श्रीकृष्ण की विजय और उजाले के स्वागत से जोड़ती है। यह साफ़-सफ़ाई, स्नान और दीयों का दिन है।
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