मासिक शिवरात्रि: हर महीने शिव की रात
हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की रात मासिक शिवरात्रि है। धर्मसिंधु कहता है कि यह अपनी इच्छा का (काम्य) व्रत है, और इसकी तिथि महाशिवरात्रि की तरह ही निशीथ, यानी लगभग आधी रात, में चल रही चतुर्दशी से तय होती है। शाम-रात की शिव-पूजा, जप और जितना हो सके जागरण इसकी पहचान हैं।
हर महीने की शिवरात्रि: शाम-रात में शिव-पूजा।
मासिक शिवरात्रि क्या है
हर चांद्र महीने में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी, यानी अमावस्या से एक दिन पहले की तिथि, शिव की रात मानी जाती है। यही मासिक शिवरात्रि है। साल में ऐसी बारह-तेरह रातें आती हैं; इनमें से अमांत माघ (पूर्णिमांत फाल्गुन) वाली सबसे बड़ी है: महाशिवरात्रि।
मुहूर्त चिंतामणि की टीका तिथियों के स्वामी गिनाते हुए चतुर्दशी के स्वामी शिव बताती है। धर्मसिंधु कहता है कि हर महीने कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि का काम्य व्रत किया जाता है, यानी अपनी इच्छा से रखा जाने वाला व्रत; यह हर किसी के लिए नियम नहीं है।
बहुत से लोग महाशिवरात्रि पर इसका संकल्प लेकर साल भर हर महीने रखते हैं, कुछ केवल श्रावण या कार्तिक की शिवरात्रि रखते हैं, और कुछ बस उस शाम शिव-मंदिर हो आते हैं। सब अपनी-अपनी रीति है।
तारीख कैसे तय होती है
शास्त्र (धर्मसिंधु): मासिक शिवरात्रि महाशिवरात्रि की तरह निशीथ-व्यापिनी ली जाती है। निशीथ रात का आठवाँ मुहूर्त है, यानी लगभग आधी रात।
- चतुर्दशी केवल पहली रात के निशीथ में हो → पहला दिन।
- केवल दूसरी रात के निशीथ में हो → दूसरा दिन।
- दोनों रात के निशीथ में हो → दूसरा दिन। धर्मसिंधु इसका कारण देता है: दूसरे दिन प्रदोष (शाम) में भी चतुर्दशी ज़्यादा रहती है।
- किसी रात के निशीथ में न हो → महाशिवरात्रि वाले नियम से दूसरा दिन।
केवल प्रदोष क्यों नहीं: कुछ लोग वह चतुर्दशी लेते हैं जो केवल शाम (प्रदोष) में हो। धर्मसिंधु साफ़ कहता है कि इसका कोई प्रमाण नहीं; निशीथ देखा जाता है। इसलिए कभी-कभी किसी कैलेंडर में मासिक शिवरात्रि एक दिन पहले दिखती है; हमारा कैलेंडर धर्मसिंधु का निशीथ-नियम लेता है, जो महाशिवरात्रि के पेज से मेल खाता है।
पारण: धर्मसिंधु कहता है कि शिवरात्रि का व्रत रखने वाले चतुर्दशी में ही पारण करें, यानी अगली सुबह चतुर्दशी रहते हुए व्रत खोलें; चतुर्दशी सुबह जल्दी ख़त्म हो रही हो तो पंचांग देखकर सुबह-सुबह पारण कर लें।
प्रदोष से रिश्ता
मासिक शिवरात्रि से ठीक एक दिन पहले कृष्ण त्रयोदशी का प्रदोष व्रत होता है, और कई बार त्रयोदशी शाम को ही ख़त्म होकर चतुर्दशी शुरू हो जाती है। इसलिए बहुत से लोग प्रदोष और शिवरात्रि को साथ-साथ रखते हैं। ध्यान रहे कि दोनों के नियम अलग हैं: प्रदोष व्रत में त्रयोदशी शाम के तीन मुहूर्त में देखी जाती है, शिवरात्रि में चतुर्दशी आधी रात में।
परिवार कैसे मनाते हैं: परंपरा
शाम को शिव-मंदिरों में जल, दूध और बेलपत्र चढ़ाने वालों की कतार; घरों में दीया और ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप। श्रावण की मासिक शिवरात्रि उत्तर भारत में ख़ास है: कांवड़ यात्रा करने वाले इसी दिन के आसपास गंगाजल चढ़ाते हैं। दक्षिण भारत के मंदिरों में हर मासिक शिवरात्रि पर रात में अभिषेक होता है। कुछ परिवार इस रात भजन-कीर्तन रखते हैं, कुछ बस एक समय फलाहार करते हैं।
रीतियाँ इलाक़े और कुल के हिसाब से अलग हैं; परंपरा कहती है कि शिव भाव देखते हैं, विधि की लंबाई नहीं।
सरल पूजा
- सुबह स्नान और संकल्प: ‘आज शिव का स्मरण और व्रत करूँगा/करूँगी।’
- दिन में फलाहार या एक समय का हल्का भोजन, सेहत के हिसाब से।
- शाम को शिवलिंग या शिव के चित्र पर जल, फिर दूध, फिर जल चढ़ाएँ।
- बेलपत्र (तीन पत्तियों वाला), सफ़ेद फूल, चंदन और अक्षत अर्पित करें; दीया जलाएँ।
- ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप या शिव-स्तुति।
- रात में जितना हो सके जागकर जप, और आधी रात के आसपास एक छोटी पूजा।
- अगली सुबह चतुर्दशी रहते हुए पारण।
पूरी रात न जाग सकें तो थोड़ी देर का जागरण और जप भी परंपरा में पूरा माना जाता है।
सेहत
उपवास और सेहत: उपवास अपनी सेहत के हिसाब से रखें। जिनकी तबीयत ठीक न हो, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाएँ, डायबिटीज़ वाले, बुज़ुर्ग या नियमित दवा लेने वाले लोग फल, दूध या एक समय के सादे भोजन वाला हल्का रूप चुनें, या डॉक्टर से पूछ लें। दवा का समय न बदलें। निर्जला (बिना पानी) व्रत की कोई ज़रूरत नहीं; पानी पीते रहें। हर महीने रात भर जागना सबके लिए ठीक नहीं; नींद पूरी करना भी सेहत का हिस्सा है।
सेहत के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा है; कोई व्रत इसकी जगह नहीं लेता। धतूरा और आक शिव को अर्पित होते हैं, पर ये खाने की चीज़ें नहीं; बच्चों की पहुँच से दूर रखें।
ePandit में
ePandit में: त्योहार का दिन हमारा कैलेंडर आपके शहर के सूर्योदय-सूर्यास्त से दिखाता है। दिन एक बार उज्जैन के हिसाब से तय होता है, आपके शहर का समय अलग दिखता है। हम अभी मुहूर्त नहीं निकालते, और किसी त्योहार को किसी के लिए अच्छा या बुरा नहीं बताते।
उपवास अपनी सेहत के हिसाब से रखें। डायबिटीज़, गर्भावस्था, बुज़ुर्ग या नियमित दवा लेने वाले लोग फल, दूध या एक समय के भोजन वाला हल्का रूप चुन सकते हैं; सेहत के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
महाशिवरात्रि से क्या अंतर है?
नियम वही है: निशीथ में चतुर्दशी। हर कृष्ण चतुर्दशी मासिक शिवरात्रि है; अमांत माघ (पूर्णिमांत फाल्गुन) वाली महाशिवरात्रि है।
कुछ कैलेंडर एक दिन पहले क्यों दिखाते हैं?
कुछ लोग केवल प्रदोष (शाम) वाली चतुर्दशी लेते हैं। धर्मसिंधु कहता है कि इसका कोई प्रमाण नहीं; निशीथ देखा जाता है।
क्या हर महीने रखना ज़रूरी है?
नहीं। धर्मसिंधु इसे काम्य, यानी अपनी इच्छा का व्रत कहता है। जितना और जब मन हो, उतना रखें।
दोनों रात आधी रात में चतुर्दशी हो तो?
दूसरा दिन, क्योंकि धर्मसिंधु के अनुसार उस दिन शाम में भी चतुर्दशी ज़्यादा रहती है।
व्रत कब खोलें?
धर्मसिंधु चतुर्दशी में ही पारण कहता है, यानी अगली सुबह चतुर्दशी रहते हुए।
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