श्रीकृष्ण जन्माष्टमी: आधी रात का जन्मोत्सव
जन्माष्टमी भाद्रपद (अमांत श्रावण) की कृष्ण अष्टमी है, श्रीकृष्ण के जन्म की रात। धर्मसिंधु के अनुसार अष्टमी वह ली जाती है जो निशीथ, यानी आधी रात, में हो; रोहिणी नक्षत्र साथ हो तो और विशेष। वैष्णव परंपरा कई बार अगले दिन मनाती है।
श्रीकृष्ण के जन्म की आधी रात: उपवास, झाँकी, भजन और आधी रात को जन्मोत्सव।
जन्माष्टमी क्या है
जन्माष्टमी श्रीकृष्ण के जन्म की रात है। निर्णय सिंधु इसे भाद्रपद कृष्ण अष्टमी कहता है (पूर्णिमांत पंचांग); अमांत पंचांग में वही दिन श्रावण कृष्ण अष्टमी है। यह आमतौर पर अगस्त या सितंबर में आती है।
दिन भर व्रत, घरों और मंदिरों में झाँकियाँ, भजन, और ठीक आधी रात को जन्मोत्सव: शंख, घंटे, ‘नंद के आनंद भयो’ और पालने में लड्डू-गोपाल।
तारीख कैसे तय होती है
शास्त्र (धर्मसिंधु): अष्टमी वह ली जाती है जो निशीथ में हो। धर्मसिंधु कहता है: रात का आधा निशीथ है; मोटे तौर पर रात का आठवाँ मुहूर्त।
- अष्टमी केवल पहले दिन निशीथ में → पहला दिन (भले सप्तमी से जुड़ी हो)।
- केवल दूसरे दिन निशीथ में → दूसरा दिन।
- दोनों दिन निशीथ में, या किसी दिन नहीं → दूसरा दिन।
रोहिणी: अगर अष्टमी के साथ निशीथ में रोहिणी नक्षत्र भी हो, तो उसे ‘जयंती’ कहा जाता है और विशेष माना जाता है। धर्मसिंधु रोहिणी के साथ और बिना रोहिणी के कई उदाहरण देकर यही नियम लगाता है।
स्मार्त और वैष्णव: ऊपर का नियम स्मार्त गृहस्थों का है। वैष्णव परंपरा (जैसे इस्कॉन, वल्लभ संप्रदाय) आम तौर पर सप्तमी से जुड़ी अष्टमी को छोड़कर सूर्योदय वाली अष्टमी लेती है, इसलिए कई साल वह अगले दिन मनाती है। यह वैष्णव नियम हमारी लाइब्रेरी में इस रूप में नहीं मिला, इसलिए इसे परंपरा कहा गया है। जिस साल दोनों दिन अलग हों, हम दोनों दिखाते हैं।
कथा: परंपरा / पुराण कथा
परंपरा के अनुसार मथुरा का राजा कंस अपनी बहन देवकी की आठवीं संतान से डरता था, इसलिए उसने देवकी और वसुदेव को कारागार में रखा। भादों की अँधेरी, बरसाती आधी रात को, रोहिणी नक्षत्र में, आठवीं संतान के रूप में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। पहरेदार सो गए, ताले खुल गए, और वसुदेव बालक को टोकरी में रखकर उफनती यमुना पार कर गोकुल में नंद और यशोदा के घर छोड़ आए। कृष्ण का बचपन गोकुल और वृंदावन में बीता: माखन-चोरी, गायें चराना, बाँसुरी।
निर्णय सिंधु एक वचन उद्धृत करता है कि भाद्रपद की कृष्ण अष्टमी को देवकी-पुत्र कृष्ण का जन्म हुआ। कथा के विस्तार को हम परंपरा के रूप में रखते हैं।
परिवार कैसे मनाते हैं
मथुरा-वृंदावन में यह साल का सबसे बड़ा उत्सव है, और अगले दिन नंदोत्सव। महाराष्ट्र और गोवा में अगले दिन दही-हांडी (गोपालकाला): युवा मानव-पिरामिड बनाकर ऊँचाई पर टँगी मटकी फोड़ते हैं। गुजरात में द्वारका, और ओडिशा-बंगाल में भी बड़ा उत्सव। दक्षिण में ‘गोकुलाष्टमी’ या ‘कृष्ण जयंती’: घर के दरवाज़े से पूजा-स्थान तक चावल के आटे से नन्हे पैरों के निशान बनाए जाते हैं, मानो बाल-कृष्ण घर में आ रहे हों।
सरल पूजा
- सुबह स्नान और संकल्प; दिन भर फलाहार या अपनी क्षमता का व्रत।
- पूजा-स्थान पर पालना सजाएँ, फूल-पत्तों से झाँकी।
- आधी रात को लड्डू-गोपाल (या कृष्ण के चित्र) का पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से स्नान, फिर साफ़ जल।
- नए वस्त्र, तुलसी, माखन-मिश्री और पंजीरी का भोग।
- आरती, पालना झुलाना, जन्म के भजन।
- पारण अगले दिन, परिवार की रीति से (कई लोग आधी रात के प्रसाद से ही खोलते हैं)।
सुरक्षा और सेहत
उपवास और सेहत: उपवास अपनी सेहत के हिसाब से रखें। डायबिटीज़, ब्लड प्रेशर, गर्भावस्था, स्तनपान, बुज़ुर्ग उम्र या नियमित दवा हो तो फल, दूध या एक समय के सादे भोजन वाला हल्का रूप भी परंपरा में है। दवा का समय न बदलें। सेहत के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा है; कोई व्रत इसकी जगह नहीं लेता।
दही-हांडी: ऊँचे पिरामिड में चोट का खतरा रहता है; हेलमेट, नीचे गद्दे, प्रशिक्षित टीम और बच्चों को ऊपर की परतों पर न चढ़ाना ज़रूरी है। स्थानीय नियम मानें। आधी रात मंदिरों की भीड़ में बच्चों और बुज़ुर्गों का ध्यान रखें; बरसात के मौसम में फिसलन से सावधान।
ePandit में
ePandit में: त्योहार का दिन हमारा कैलेंडर आपके शहर के सूर्योदय-सूर्यास्त से दिखाता है। दिन एक बार उज्जैन के हिसाब से तय होता है, आपके शहर का समय अलग दिखता है। हम अभी मुहूर्त नहीं निकालते, और किसी त्योहार को किसी के लिए अच्छा या बुरा नहीं बताते।
उपवास अपनी सेहत के हिसाब से रखें। डायबिटीज़, गर्भावस्था, बुज़ुर्ग या नियमित दवा लेने वाले लोग फल, दूध या एक समय के भोजन वाला हल्का रूप चुन सकते हैं; सेहत के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा। दही-हांडी में ऊँचे पिरामिड पर सुरक्षा (हेलमेट, गद्दे, बच्चों को ऊपर न चढ़ाना) ज़रूरी है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
स्मार्त और वैष्णव की तारीख अलग क्यों?
धर्मसिंधु (स्मार्त) निशीथ में अष्टमी देखता है। वैष्णव परंपरा आम तौर पर सप्तमी-युक्त अष्टमी छोड़कर सूर्योदय वाली अष्टमी लेती है, इसलिए कभी अगला दिन। अपने परिवार की परंपरा मानें।
रोहिणी नक्षत्र का क्या महत्व?
श्रीकृष्ण का जन्म रोहिणी में माना जाता है। अष्टमी के साथ रोहिणी हो तो उसे ‘जयंती’ कहा जाता है; बिना रोहिणी के भी व्रत पूरा है।
भाद्रपद या श्रावण?
दोनों सही हैं। निर्णय सिंधु इसे भाद्रपद कृष्ण अष्टमी कहता है (पूर्णिमांत); अमांत पंचांग में वही श्रावण कृष्ण अष्टमी है।
व्रत आधी रात खोलें या अगले दिन?
दोनों रीतियाँ प्रचलित हैं। ग्रंथ तिथि और नक्षत्र के बाद पारण की बात करते हैं; सेहत की ज़रूरत हो तो आधी रात के प्रसाद से खोलना भी ठीक है।
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