होलिका दहन: फाल्गुन पूर्णिमा की अग्नि
होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा की रात होता है, रंग वाली होली से एक शाम पहले। धर्मसिंधु के अनुसार वह पूर्णिमा ली जाती है जो प्रदोष (सूर्यास्त के बाद का समय) में हो और जिसमें भद्रा न हो। भद्रा हो तो ग्रंथ के उप-नियम लगते हैं, और दिन में दहन किसी भी ग्रंथ के अनुकूल नहीं। परंपरा इसे प्रह्लाद की भक्ति और नई फसल से जोड़ती है।
फाल्गुन पूर्णिमा की रात अग्नि जलाकर प्रह्लाद की भक्ति और होलिका की कथा का स्मरण।
होलिका दहन क्या है
फाल्गुन पूर्णिमा की रात मोहल्ले या गाँव के चौराहे पर लकड़ी और उपलों का ढेर जलाया जाता है: यही होलिका दहन है। लोग उसकी परिक्रमा करते हैं, नई फसल की बालियाँ भूनते हैं, और अगली सुबह रंगों की होली खेलते हैं।
उत्तर भारत में इसे ‘होली जलाना’ कहते हैं; बंगाल और ओडिशा में दोल उत्सव से पहले की रात का दहन होता है; तमिलनाडु और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में इसी समय कामदेव के दहन (काम दहन) की कथा याद की जाती है। रीति अलग, भाव एक: सर्दी की विदाई, नई फसल का स्वागत, और बुराई पर भक्ति की जीत।
दिन और समय कैसे तय होता है
शास्त्र (धर्मसिंधु): फाल्गुन पूर्णिमा को ही होलिका कहते हैं, और वह प्रदोष-व्यापिनी और भद्रा-रहित ली जाती है। प्रदोष सूर्यास्त के बाद का लगभग ढाई घंटे का समय है। निर्णयसिंधु भी फाल्गुन पूर्णिमा को प्रदोष-व्यापिनी लेने की बात कहता है।
| स्थिति | दहन |
|---|---|
| केवल एक शाम प्रदोष में पूर्णिमा, भद्रा नहीं | उसी शाम |
| दोनों शाम प्रदोष में पूर्णिमा | दूसरी शाम |
| प्रदोष में भद्रा, जो आधी रात से पहले खत्म हो | भद्रा खत्म होने के बाद |
| भद्रा आधी रात के बाद तक | भद्रा का मुख छोड़कर, पुच्छ में |
भद्रा विष्टि करण का प्रचलित नाम है, जो तिथि के आधे हिस्से जितना चलता है। धर्मसिंधु भद्रा के आखिरी तीन घड़ी के हिस्से को पुच्छ और चौथे पाद की शुरुआती पाँच घड़ियों को मुख कहता है। कुछ और बारीक स्थितियों के लिए भी ग्रंथ में उप-नियम हैं; हमारा कैलेंडर उन्हीं से समय चुनता है।
शास्त्र (धर्मसिंधु): दिन में होलिका दहन किसी भी ग्रंथ के अनुकूल नहीं है।
होलाष्टक की बात
होली से पहले के आठ दिनों को कई जगह होलाष्टक कहा जाता है और उनमें विवाह जैसे काम नहीं रखे जाते। शास्त्र (मुहूर्त चिंतामणि): ग्रंथ यह रोक केवल कुछ क्षेत्रों के लिए बताता है: विपाशा (ब्यास), इरावती (रावी) और शतद्रु (सतलुज) नदियों के तट के देश और त्रिपुष्कर; अन्य देशों में नहीं।
इसलिए होलाष्टक को डर की तरह न देखें; यह एक क्षेत्रीय रीति है। आपके परिवार में जो चलन है, वही अपनाएँ।
कथा: परंपरा / पुराण कथा
परंपरा में राजा हिरण्यकशिपु चाहता था कि सब उसी को पूजें, पर उसका बेटा प्रह्लाद भगवान विष्णु का भक्त था। राजा की बहन होलिका के पास आग से बचाने वाला वरदान माना जाता था; वह प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठी। कथा के अनुसार भक्ति के आगे वरदान काम न आया: होलिका जल गई और प्रह्लाद सुरक्षित रहे। बाद में भगवान नृसिंह के रूप में प्रकट हुए।
यह कथा हमारी लाइब्रेरी के ग्रंथों में नहीं मिली; हम इसे परंपरा के रूप में रखते हैं। इसका सार है अहंकार पर भक्ति की जीत, किसी का मज़ाक या डर नहीं।
परिवार कैसे मनाते हैं
शास्त्र (धर्मसिंधु): ग्रंथ सूखी लकड़ी और उपलों का ढेर बनाकर जलाने, उसकी पूजा करने, अग्नि की तीन परिक्रमा करने और नारियल अर्पित करने की बात कहता है।
परंपरा में दिन में महिलाएँ होलिका की पूजा करती हैं: रोली, अक्षत, फूल, गुड़, कच्चा सूत ढेर के चारों ओर लपेटना, और जल अर्पित करना। रात को दहन के समय गेहूँ, जौ या चने की नई बालियाँ आग में भूनकर प्रसाद की तरह बाँटी जाती हैं। कई घर दहन की थोड़ी सी ठंडी राख अगली सुबह माथे पर लगाते हैं। कहीं उपलों की माला (बड़कुल्ले) बनाई जाती है।
सरल रूप: शाम को घर में दीया, प्रह्लाद और भगवान नृसिंह का स्मरण, फिर मोहल्ले के सामूहिक दहन में परिवार के साथ शामिल होना। अलग-अलग घरों में अलग आग जलाने से बेहतर है एक साझा, सुरक्षित होलिका।
सुरक्षा, पेड़ और जीव
आग से सुरक्षा: होलिका खुली जगह पर, बिजली के तारों, घरों, गाड़ियों और पेड़ों से दूर बनाएँ। जलती आग से सुरक्षित दूरी रखें। बच्चों का हाथ थामें और उन्हें आग के पास न जाने दें। ढीले कपड़े, दुपट्टा, साड़ी का पल्लू और लंबे खुले बाल समेटकर रखें; सिंथेटिक कपड़ों से बचें। पास में पानी या रेत की बाल्टी रखें। जलने पर ठंडा बहता पानी डालें और डॉक्टर को दिखाएँ।
क्या न जलाएँ: प्लास्टिक, टायर, रबर, पेंट लगी लकड़ी या कचरा न डालें; इनका धुआँ फेफड़ों के लिए नुकसानदेह है, खासकर बच्चों, बुज़ुर्गों और दमा वाले लोगों के लिए। हरे पेड़ न काटें; ग्रंथ भी सूखी लकड़ी और उपलों की बात करता है।
जीवों का ध्यान: ढेर कई दिन पहले से जमा होता है, उसमें कुत्ते, बिल्ली, पक्षी या छोटे जीव छिप जाते हैं। जलाने से पहले ढेर को हिलाकर और देखकर जाँच लें। किसी जानवर को आग के पास न बाँधें, न डराएँ।
कुछ लोग दहन तक व्रत रखते हैं; बीमार, गर्भवती, डायबिटीज़ वाले या दवा लेने वाले लोग हल्का रूप लें या डॉक्टर से पूछ लें।
ePandit में
ePandit में: त्योहार का दिन हमारा कैलेंडर आपके शहर के सूर्योदय-सूर्यास्त से दिखाता है। दिन एक बार उज्जैन के हिसाब से तय होता है, आपके शहर का समय अलग दिखता है। हम अभी मुहूर्त नहीं निकालते, और किसी त्योहार को किसी के लिए अच्छा या बुरा नहीं बताते।
आग से सुरक्षित दूरी, ढीले कपड़े और बच्चों पर ध्यान; बिजली के तारों और पेड़ों से दूर जलाएँ; हरे पेड़ न काटें, पानी पास रखें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
भद्रा में दहन क्यों नहीं?
धर्मसिंधु भद्रा-रहित प्रदोष चुनने को कहता है; भद्रा आधी रात से पहले खत्म हो तो उसके बाद, देर तक रहे तो उसके मुख को छोड़कर पुच्छ में।
होलाष्टक क्या है?
मुहूर्त चिंतामणि होलिका से पहले आठ दिन विवाह आदि न रखने की बात कुछ ही क्षेत्रों (विपाशा, इरावती, शतद्रु के तट, त्रिपुष्कर) के लिए कहता है, बाकी के लिए नहीं।
रंग वाली होली कब?
अगले दिन, अमांत फाल्गुन (पूर्णिमांत चैत्र) की कृष्ण प्रतिपदा को, जो सूर्योदय पर हो।
क्या घर पर अलग होलिका जलानी है?
ज़रूरी नहीं। मोहल्ले की साझा होलिका में शामिल होना सुरक्षित भी है और परंपरा में भी है; घर पर दीया और स्मरण काफ़ी है।
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