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हरतालिका तीज: शिव-पार्वती की पूजा का व्रत

हरतालिका तीज भाद्रपद शुक्ल तृतीया का व्रत है, जिसमें शिव और पार्वती की पूजा होती है। धर्मसिंधु के अनुसार इसमें चतुर्थी से जुड़ी तृतीया ली जाती है: अगले दिन तृतीया एक मुहूर्त या उससे कम भी हो, तो वही दिन। अगले दिन तृतीया हो ही नहीं, तो द्वितीया-युक्त दिन। व्रत, कथा और रात का जागरण इसकी पहचान हैं; व्रत का रूप अपनी सेहत से चुनें।

शिव-पार्वती की पूजा का स्त्रियों का व्रत, मुख्यतः उत्तर भारत, राजस्थान, महाराष्ट्र और नेपाल में।

हरतालिका तीज क्या है

सावन-भादो में तीन ‘तीज’ आती हैं: श्रावण शुक्ल तृतीया को हरियाली तीज, भाद्रपद कृष्ण तृतीया को कजरी तीज, और भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हरतालिका तीज। तीसरी तीज गणेश चतुर्थी से ठीक एक दिन पहले आती है।

इस दिन स्त्रियाँ व्रत रखकर मिट्टी या बालू से बने शिव-पार्वती की पूजा करती हैं, कथा सुनती हैं और कई जगह रात भर भजन-जागरण करती हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, महाराष्ट्र और नेपाल में यह खास तौर पर मनाई जाती है। विवाहित और अविवाहित दोनों इसे अपनी इच्छा से रखती हैं। परंपरा इसे शिव-पार्वती के अटूट साथ और श्रद्धा का दिन मानती है।

दिन कैसे तय होता है

शास्त्र (धर्मसिंधु): भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हरितालिका व्रत होता है। इस व्रत में चतुर्थी-युक्त तृतीया ली जाती है, इसलिए:

स्थिति दिन
अगले दिन तृतीया एक मुहूर्त या उससे भी कम हो अगला दिन
अगले दिन तृतीया हो ही नहीं (तिथि-क्षय) द्वितीया-युक्त पहला दिन
पहले दिन पूरी (साठ घड़ी) तृतीया, अगले दिन थोड़ी अगला दिन, चतुर्थी-युक्त

ग्रंथ इसका कारण गण-योग की प्रशंसा बताता है: तृतीया (गौरी की तिथि) और चतुर्थी (गणेश की तिथि) का मेल इस व्रत में श्रेष्ठ माना गया। एक मुहूर्त लगभग 48 मिनट का है।

कथा: परंपरा / पुराण कथा

परंपरा नाम को ‘हरित’ (ले जाई गई) और ‘आलिका’ (सखी) से जोड़ती है। कथा है कि पार्वती मन से शिव को चाहती थीं, पर पिता हिमालय उनका विवाह कहीं और तय करना चाहते थे। तब सखियाँ पार्वती को घने वन में ले गईं, जहाँ उन्होंने भाद्रपद शुक्ल तृतीया को बालू से शिवलिंग बनाकर पूजा की और रात भर जागरण किया। उनकी तपस्या और दृढ़ता से शिव प्रसन्न हुए और बाद में उनका विवाह हुआ।

यह कथा हमारी लाइब्रेरी के ग्रंथों में नहीं मिली; हम इसे परंपरा के रूप में रखते हैं। इसका सार है अपने मन की बात पर टिके रहना, सखियों का साथ, और श्रद्धा।

परिवार कैसे मनाते हैं

शास्त्र (धर्मसिंधु): इस व्रत में भवानी (पार्वती) और शिव की पूजा और उपवास की बात कही गई है।

परंपरा में स्त्रियाँ सुबह स्नान करके नए या हरे-लाल कपड़े, मेहंदी और शृंगार करती हैं। शाम को केले के पत्तों और फूलों से मंडप (फुलेरा) सजाया जाता है, उसमें मिट्टी या बालू के शिव, पार्वती और कई जगह गणेश रखे जाते हैं। बेलपत्र, धतूरा, शमी, फूल और सुहाग की चीज़ें अर्पित होती हैं, स्त्रियाँ साथ बैठकर कथा सुनती हैं, और रात भर भजन गाती हैं। अगली सुबह पूजा, प्रतिमा का विसर्जन और पारण।

नेपाल में तीज पर लाल साड़ी, नाच-गाना और मंदिर-दर्शन होते हैं; महाराष्ट्र में ‘हरितालिका’ की पूजा घर में होती है। कुछ घरों में इसे बहुत सादगी से, कुछ में बड़े उत्सव की तरह मनाते हैं।

सरल पूजा

  1. सुबह स्नान, शिव-पार्वती का स्मरण, और अपनी सेहत के हिसाब से व्रत (नीचे देखें)।
  2. शाम को साफ़ चौकी पर मिट्टी या बालू से छोटे शिवलिंग और पार्वती बनाएँ, या चित्र रखें।
  3. दीया जलाएँ; बेलपत्र, फूल, अक्षत, रोली और मौसमी फल अर्पित करें।
  4. ‘ॐ नमः शिवाय’ और पार्वती का स्मरण, कथा सुनें, आरती करें।
  5. जितना हो सके उतना जागरण-भजन, फिर आराम; अगली सुबह पूजा, विसर्जन (घर पर बाल्टी या गमले में) और पारण।

कोई पैसे वाली पूजा ज़रूरी नहीं।

सेहत और सुरक्षा

उपवास और सेहत: उपवास अपनी सेहत के हिसाब से रखें। जो लोग बीमार हैं, गर्भवती हैं, जिन्हें डायबिटीज़ है या जो नियमित दवा लेते हैं, वे फल, दूध या एक समय के सादे भोजन वाला हल्का रूप चुन सकते हैं, या पहले डॉक्टर से पूछ लें। दवा का समय न बदलें। सेहत के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा है; कोई व्रत इसकी जगह नहीं लेता।

निर्जला व्रत (पानी के बिना, लगभग पूरे दिन-रात) कई जगह की रीति है, पर यह हर किसी के लिए नहीं। डायबिटीज़ में शुगर गिर सकती है, गर्भावस्था और स्तनपान में पानी की कमी नुकसान कर सकती है, और गर्मी-उमस वाले भादो में पानी की कमी जल्दी होती है। पानी, फल या दूध वाला रूप भी परंपरा में है; पूजा, कथा और श्रद्धा से व्रत पूरा है। चक्कर, घबराहट या कमज़ोरी लगे तो पानी पिएँ, कुछ खाएँ और डॉक्टर से बात करें।

रात के जागरण में नींद पूरी न हो तो अगले दिन गाड़ी न चलाएँ। दीयों को कपड़ों और फूलों से दूर रखें। यह व्रत अपनी इच्छा का है; किसी पर दबाव या डर से नहीं।

ePandit में

ePandit में: त्योहार का दिन हमारा कैलेंडर आपके शहर के सूर्योदय-सूर्यास्त से दिखाता है। दिन एक बार उज्जैन के हिसाब से तय होता है, आपके शहर का समय अलग दिखता है। हम अभी मुहूर्त नहीं निकालते, और किसी त्योहार को किसी के लिए अच्छा या बुरा नहीं बताते।

उपवास अपनी सेहत के हिसाब से रखें। डायबिटीज़, गर्भावस्था, बुज़ुर्ग या नियमित दवा लेने वाले लोग फल, दूध या एक समय के भोजन वाला हल्का रूप चुन सकते हैं; सेहत के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा। निर्जला व्रत हर किसी के लिए नहीं; पानी और फल वाला रूप भी परंपरा में है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

नाम का अर्थ क्या है?

परंपरा में ‘हरित-आलिका’: सखियों द्वारा पार्वती को वन में ले जाने की कथा।

क्या सिर्फ़ विवाहित स्त्रियाँ रखती हैं?

नहीं, विवाहित और अविवाहित दोनों रखती हैं; यह अपनी इच्छा का व्रत है। इससे किसी रिश्ते या विवाह का कोई वादा नहीं जुड़ा; यह श्रद्धा की रीति है।

तारीख कैसे तय होती है?

धर्मसिंधु चतुर्थी-युक्त तृतीया को श्रेष्ठ कहता है: अगले दिन थोड़ी भी तृतीया हो तो वही दिन।

क्या निर्जला ही रखना है?

नहीं। सेहत के हिसाब से पानी, फल या दूध वाला रूप भी परंपरा में है। सेहत के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा।

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आधार: धर्मसिंधु, हरितालिका-व्रत, भाद्रपद शुक्ल तृतीया · धर्मसिंधु, हरितालिका-व्रत (मूल), मुहूर्त भर या उससे कम हो तब भी अगला दिन · धर्मसिंधु, हरितालिका-व्रत (मूल), क्षय हो तो द्वितीया-युक्त · धर्मसिंधु, हरितालिका-व्रत (भाषा-टीका), दूसरे दिन थोड़ी भी चतुर्थी-युक्त · धर्मसिंधु, हरितालिका-व्रत, भवानी-शिव की पूजा और उपवास · परंपरा, ‘हरित-आलिका’ नाम और पार्वती की कथा; फुलेरा, रात्रि-जागरण, निर्जला की रीति; तीन तीज