हनुमान जयंती: भक्ति और सेवा का दिन

उत्तर भारत में हनुमान जयंती चैत्र पूर्णिमा को मनाई जाती है; कुछ क्षेत्रों में दूसरे दिन, जैसे दिवाली से पहले की कृष्ण चतुर्दशी या दक्षिण में मार्गशीर्ष-वैशाख के दिन। हमारी लाइब्रेरी के ग्रंथों में इसका तिथि-नियम नहीं मिला, इसलिए यहाँ इसे परंपरा के रूप में दिया गया है।

हनुमान जी के जन्म का दिन: पाठ, मंदिर-दर्शन और सेवा।

हनुमान जयंती क्या है

हनुमान जी के जन्म का दिन, जिसे कई लोग ‘हनुमान जन्मोत्सव’ कहना पसंद करते हैं। हनुमान रामायण के सबसे प्रिय पात्रों में हैं: बल, बुद्धि, विनम्रता और राम के प्रति अटूट भक्ति के प्रतीक। इस दिन मंदिरों में भोर से भीड़ होती है, हनुमान चालीसा और सुंदरकांड का पाठ होता है, और बहुत से लोग सेवा के काम करते हैं।

तारीख कैसे तय होती है

परंपरा: हमने धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु और मुहूर्त चिंतामणि में हनुमान जयंती का तिथि-नियम खोजा, पर नहीं मिला। इसलिए यहाँ प्रचलित परंपरा दी जा रही है:

क्षेत्र दिन
उत्तर और मध्य भारत, महाराष्ट्र चैत्र पूर्णिमा
कुछ उत्तर-पश्चिम परंपराएँ कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी (अमांत आश्विन), दिवाली से एक दिन पहले
आंध्र-तेलंगाना वैशाख कृष्ण दशमी (41 दिन की दीक्षा के अंत में)
तमिलनाडु, केरल मार्गशीर्ष (मार्गली) अमावस्या, मूल नक्षत्र
कर्नाटक मार्गशीर्ष शुक्ल त्रयोदशी (हनुमद् व्रत)

हमारा कैलेंडर उत्तर भारतीय दिन (चैत्र पूर्णिमा, सूर्योदय वाली पूर्णिमा) दिखाता है; बाकी क्षेत्रीय दिन वैदिक टीम की जाँच के बाद जोड़े जाएँगे। सभी परंपराएँ आदर से मनाई जाती हैं; कोई एक ‘सही’ और बाकी ‘गलत’ नहीं।

कथा: परंपरा / पुराण कथा

परंपरा के अनुसार हनुमान अंजनी और वानरराज केसरी के पुत्र हैं, और पवन देव के आशीर्वाद से जन्मे, इसलिए ‘पवनपुत्र’ और ‘आंजनेय’ कहलाते हैं। एक प्रसिद्ध कथा है कि बचपन में उन्होंने उगते सूर्य को फल समझकर पकड़ने के लिए छलाँग लगा दी। बड़े होकर वे सुग्रीव के मंत्री बने, राम से मिले, समुद्र लाँघकर लंका में सीता का पता लगाया, और लक्ष्मण के लिए संजीवनी बूटी के साथ पूरा पर्वत उठा लाए।

तुलसीदास की हनुमान चालीसा इन्हीं गुणों का गान है। परंपरा हनुमान को चिरंजीवी मानती है, जो जहाँ राम-कथा होती है वहाँ उपस्थित रहते हैं।

परिवार कैसे मनाते हैं

भोर में मंदिरों में जन्मोत्सव, क्योंकि कई परंपराएँ सूर्योदय के समय जन्म मानती हैं। मूर्ति पर सिंदूर और चमेली का तेल (चोला) चढ़ाना, लाल फूल, गुड़-चना या बूंदी के लड्डू का भोग। मोहल्लों में शोभायात्रा, अखाड़ों में कुश्ती-प्रदर्शन, और सामूहिक हनुमान चालीसा पाठ (कई जगह 108 बार)। दक्षिण में 41 दिन की दीक्षा, पान के पत्तों और वडा-माला की भेंट।

सरल पूजा

  1. सुबह स्नान, साफ़ कपड़े।
  2. हनुमान जी का चित्र, साथ में राम-दरबार हो तो अच्छा, क्योंकि परंपरा कहती है कि हनुमान राम-नाम से प्रसन्न होते हैं।
  3. दीया, लाल फूल, और अपनी रीति से सिंदूर।
  4. हनुमान चालीसा या सुंदरकांड का पाठ; न आता हो तो ‘श्री राम जय राम जय जय राम’ का जप।
  5. गुड़-चना या लड्डू का भोग, फिर बाँटना।
  6. दिन में किसी की मदद करें: हनुमान की भक्ति का सार सेवा है।

सुरक्षा

मंदिरों में भोर की भीड़ में बुज़ुर्गों और बच्चों का ध्यान रखें; धक्का-मुक्की से बचें। चैत्र में गर्मी होती है, शोभायात्रा में पानी साथ रखें। सिंदूर-तेल केवल मूर्ति के लिए है; बच्चों की आँखों और मुँह से दूर रखें। व्रत रखें तो अपनी सेहत के हिसाब से; सेहत के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा।

ePandit में

ePandit में: त्योहार का दिन हमारा कैलेंडर आपके शहर के सूर्योदय-सूर्यास्त से दिखाता है। दिन एक बार उज्जैन के हिसाब से तय होता है, आपके शहर का समय अलग दिखता है। हम अभी मुहूर्त नहीं निकालते, और किसी त्योहार को किसी के लिए अच्छा या बुरा नहीं बताते।

मंदिर की भीड़ में बुज़ुर्गों और बच्चों का ध्यान; गर्मी में पानी साथ।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

हनुमान जयंती की दो तारीखें क्यों?

अलग-अलग क्षेत्रों की अपनी परंपराएँ हैं: उत्तर भारत में चैत्र पूर्णिमा, कुछ जगह दिवाली से पहले की चतुर्दशी, और दक्षिण में दूसरे दिन। सब आदर से मनाई जाती हैं।

क्या ग्रंथ में इसका नियम मिला?

हमारी लाइब्रेरी (धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु, मुहूर्त चिंतामणि) में नहीं मिला; इसलिए हमने इसे परंपरा कहा है।

हनुमान चालीसा न आती हो तो?

‘श्री राम जय राम जय जय राम’ या ‘जय हनुमान’ का सरल जप भी पूरा है।

क्या व्रत ज़रूरी है?

नहीं। कुछ लोग रखते हैं; अपनी सेहत के हिसाब से।

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आधार: परंपरा, चैत्र पूर्णिमा (उत्तर भारत); दूसरे क्षेत्रीय दिन; हमारी लाइब्रेरी (धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु, मुहूर्त चिंतामणि) में नियम नहीं मिला · परंपरा, हनुमान चालीसा, सुंदरकांड, अंजनी-पवन की कथा