गुरु पूर्णिमा: व्यास और गुरुओं का दिन

गुरु पूर्णिमा आषाढ़ की पूर्णिमा है। धर्मसिंधु और निर्णय सिंधु इस पूर्णिमा पर व्यास-पूजा बताते हैं, और उसके लिए वह पूर्णिमा ली जाती है जो सूर्योदय के बाद तीन मुहूर्त रहे। आज यह सब गुरुओं, शिक्षकों और मार्गदर्शकों को आदर देने का दिन है।

वेदव्यास और अपने गुरुओं को आदर देने का दिन।

गुरु पूर्णिमा क्या है

आषाढ़ महीने की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा या व्यास पूर्णिमा कहते हैं। परंपरा इसे महर्षि वेदव्यास का जन्मदिन मानती है, जिन्होंने वेदों का विभाजन किया और महाभारत की रचना की। इसलिए इस दिन गुरु-परंपरा के मूल के रूप में व्यास का स्मरण होता है, और अपने-अपने गुरु, शिक्षक, माता-पिता और मार्गदर्शकों को प्रणाम किया जाता है।

यही दिन वर्षा ऋतु में संन्यासियों के चातुर्मास (चार महीने एक जगह रुकना) का आरंभ भी है।

तारीख कैसे तय होती है

शास्त्र (धर्मसिंधु): इस पूर्णिमा को संन्यासियों के चातुर्मास-संकल्प के अंग के रूप में क्षौर और व्यास-पूजा कही गई है, और इस कर्म में उदय-काल की तीन मुहूर्त वाली पूर्णिमा ली जाती है: वह पूर्णिमा जो सूर्योदय के बाद कम से कम तीन मुहूर्त (लगभग 2 घंटे 24 मिनट) रहे। निर्णय सिंधु भी इसी पूर्णिमा पर व्यास-पूजा का निर्णय देता है।

अगर किसी साल पूर्णिमा सूर्योदय के बाद तीन मुहूर्त से कम हो, तो पंचांग पिछले दिन (चतुर्दशी-युक्त) को लेते हैं। हमारा कैलेंडर इसी नियम से दिन दिखाता है। ध्यान दें: ग्रंथ में यह पूजा संन्यासियों के प्रसंग में है; गृहस्थों का गुरु-वंदन परंपरा से आया है।

कथा: परंपरा / पुराण कथा

परंपरा के अनुसार वेदव्यास (कृष्ण द्वैपायन) ऋषि पराशर और सत्यवती के पुत्र थे, और यमुना के एक द्वीप पर जन्मे। उन्होंने एक वेद को चार भागों में बाँटा ताकि लोग उसे सीख सकें, इसीलिए ‘व्यास’ (बाँटने वाले) कहलाए। महाभारत, और परंपरा के अनुसार पुराण, उन्हीं से जुड़े हैं। उनके शिष्य पैल, वैशंपायन, जैमिनि और सुमंतु ने वेदों की शाखाएँ आगे बढ़ाईं; धर्मसिंधु की व्यास-पूजा में इन्हीं पाँच का आवाहन होता है।

बौद्ध परंपरा में इसी पूर्णिमा को बुद्ध ने सारनाथ में पहला उपदेश दिया था, और जैन परंपरा में यह भी गुरु-वंदन का दिन है।

परिवार कैसे मनाते हैं

आश्रमों और मठों में गुरु-पूजा, प्रवचन और भंडारा। संगीत और नृत्य की परंपराओं में शिष्य अपने गुरु के चरण छूकर आशीर्वाद लेते हैं और गुरु-दक्षिणा देते हैं। स्कूल-कॉलेजों में शिक्षकों का सम्मान। बहुत से घरों में सत्यनारायण कथा या पूर्णिमा व्रत। नेपाल में यह ‘गुरु पूर्णिमा’ पर शिक्षकों का राष्ट्रीय सम्मान-दिन है। किसान परंपरा में यह बुआई के मौसम के बीच आता है।

सरल पूजा

  1. सुबह स्नान; पूजा-स्थान पर व्यास और अपने गुरु या इष्ट का चित्र।
  2. दीया, फूल, चंदन, अक्षत; ‘गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः…’ या अपने गुरु का दिया मंत्र।
  3. कोई ग्रंथ, किताब या जो आप सीख रहे हैं, उसका थोड़ा पाठ।
  4. अपने शिक्षक, माता-पिता या किसी ऐसे व्यक्ति से मिलें, फ़ोन करें या लिखें, जिससे आपने कुछ सीखा, और धन्यवाद कहें।
  5. जो सीखा है, उसे किसी और को सिखाना भी गुरु का आदर है।

किसी को पैसे देकर ‘गुरु-दीक्षा’ लेना ज़रूरी नहीं।

सुरक्षा

आषाढ़ बरसात का समय है: मंदिरों और आश्रमों की सीढ़ियों पर फिसलन, नदी किनारों पर तेज़ बहाव और पहाड़ी रास्तों पर भूस्खलन से सावधान रहें। भंडारों में साफ़ पानी पिएँ। पूर्णिमा व्रत रखें तो अपनी सेहत के हिसाब से; सेहत के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा।

ePandit में

ePandit में: त्योहार का दिन हमारा कैलेंडर आपके शहर के सूर्योदय-सूर्यास्त से दिखाता है। दिन एक बार उज्जैन के हिसाब से तय होता है, आपके शहर का समय अलग दिखता है। हम अभी मुहूर्त नहीं निकालते, और किसी त्योहार को किसी के लिए अच्छा या बुरा नहीं बताते।

बरसात का मौसम: फिसलन वाली सीढ़ियों और नदी किनारों पर सावधानी।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

ग्रंथ में ‘गुरु पूर्णिमा’ नाम है?

धर्मसिंधु और निर्णय सिंधु इस पूर्णिमा पर व्यास-पूजा बताते हैं, संन्यासियों के चातुर्मास के आरंभ में। आज इसे सब गुरुओं के आदर का दिन माना जाता है, जो परंपरा से आया है।

गुरु न हो तो?

शिक्षक, माता-पिता या कोई भी जिससे आपने सीखा, उन्हें धन्यवाद देना भी यही भाव है।

तीन मुहूर्त का नियम क्या है?

व्यास-पूजा के लिए वह पूर्णिमा ली जाती है जो सूर्योदय के बाद कम से कम तीन मुहूर्त (लगभग ढाई घंटे) रहे (धर्मसिंधु)।

क्या व्रत है?

ज़रूरी नहीं; कुछ लोग पूर्णिमा व्रत या सत्यनारायण कथा रखते हैं।

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आधार: धर्मसिंधु, आषाढ़ पूर्णिमा: संन्यासियों की व्यास-पूजा, उदय-काल की तीन मुहूर्त वाली पूर्णिमा · धर्मसिंधु, व्यास-पूजा (मूल), औदयिकी त्रिमुहूर्ता पूर्णिमा · निर्णय सिंधु, आषाढ़: व्यास-पूजा-निर्णय, इसी पूर्णिमा पर व्यास-पूजा · परंपरा, सब गुरुओं और शिक्षकों का आदर; बौद्ध और जैन परंपराओं में भी यह दिन