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एकादशी: महीने में दो बार आने वाला व्रत

एकादशी हर पक्ष की ग्यारहवीं तिथि है, यानी साल में 24 बार (अधिक मास हो तो 26)। यह भगवान विष्णु के स्मरण का व्रत माना जाता है। धर्मसिंधु स्मार्त और वैष्णव परंपरा के लिए दिन तय करने के अलग नियम देता है, इसलिए कभी-कभी दो दिन दिखते हैं। पारण अगले दिन द्वादशी में होता है।

हर महीने दो बार आने वाला विष्णु का व्रत; स्मार्त और वैष्णव के दिन कभी-कभी अलग।

एकादशी क्या है

चंद्र मास के हर पक्ष की ग्यारहवीं तिथि एकादशी है: एक शुक्ल पक्ष (बढ़ते चाँद) में और एक कृष्ण पक्ष (घटते चाँद) में। इसलिए साल में 24 एकादशियाँ होती हैं, और जिस साल अधिक मास हो उसमें 26। परंपरा इसे भगवान विष्णु का व्रत मानती है: अन्न छोड़कर, फल-दूध या सादे फलाहार के साथ, नाम-स्मरण और पूजा।

मुहूर्त-चिंतामणि तिथियों के स्वामी गिनाते हुए एकादशी के स्वामी विश्वेदेव और द्वादशी के हरि बताता है, और एकादशी को नंदा तिथियों में गिनता है। व्रत एकादशी को और पारण हरि की तिथि द्वादशी में, यह जोड़ी इस व्रत की बनावट में ही है।

स्मार्त और वैष्णव: दो नियम, कभी दो दिन

शास्त्र (धर्मसिंधु): एकादशी का व्रत रखने वाले दो तरह के माने गए हैं, स्मार्त और वैष्णव, और दोनों के लिए ‘वेध’ (दशमी का स्पर्श) अलग देखा जाता है:

  • स्मार्त: अगर सूर्योदय के समय ज़रा-सी भी दशमी हो, तो वह एकादशी ‘विद्ध’ (दशमी से छुई) मानी जाती है।
  • वैष्णव: अगर अरुणोदय (सूर्योदय से चार घड़ी, लगभग 96 मिनट पहले) के समय दशमी हो, तो एकादशी विद्ध मानी जाती है, और उसे छोड़कर अगले दिन (द्वादशी) व्रत होता है।

इसी से हमारा कैलेंडर दिन ऐसे तय करता है:

परंपरा अगले दिन व्रत, जब नहीं तो
स्मार्त एकादशी और द्वादशी दोनों अगले सूर्योदय तक बढ़ें, या द्वादशी बढ़े और एकादशी सूर्योदय पर दशमी से छुई हो एकादशी का दिन
वैष्णव अरुणोदय पर दशमी हो, या एकादशी बढ़े, या द्वादशी बढ़े एकादशी का दिन

ज़्यादातर पक्षों में दोनों एक ही दिन देते हैं; कुछ में वैष्णव एकादशी एक दिन बाद आती है। तब हम दोनों दिन अलग दिखाते हैं।

मैं कौन-सा दिन मानूँ?

शास्त्र (धर्मसिंधु): बड़े ग्रंथ कहते हैं कि जिनकी वैष्णव दीक्षा हो वे वैष्णव और बाकी स्मार्त, पर धर्मसिंधु बताता है कि बड़े-बुज़ुर्ग अपनी परंपरा से प्रसिद्ध वैष्णवता और स्मार्तता को ही मानते हैं, और यही सब देशों में चलता है।

इसलिए सीधी बात: अपने परिवार की परंपरा मानें। जो किसी वैष्णव संप्रदाय में दीक्षित हैं (जैसे इस्कॉन, वल्लभ, रामानंदी, माध्व आदि), वे आमतौर पर वैष्णव दिन रखते हैं; बाकी बहुत-से गृहस्थ स्मार्त दिन। दोनों परंपराएँ पुरानी और सम्मानित हैं; किसी को गलत कहने की ज़रूरत नहीं।

साल की 24 एकादशियाँ (परंपरा)

हर एकादशी का अपना नाम है, जो पंचांगों की परंपरा से चलता है (हमारे पुस्तकालय के ग्रंथों में यह पूरी सूची नहीं मिली, इसलिए इसे परंपरा मानें; कुछ नाम क्षेत्र के हिसाब से अलग भी मिलते हैं):

महीना शुक्ल पक्ष कृष्ण पक्ष (पूर्णिमांत महीना)
चैत्र कामदा पापमोचनी
वैशाख मोहिनी वरूथिनी
ज्येष्ठ निर्जला अपरा
आषाढ़ देवशयनी योगिनी
श्रावण पुत्रदा (पवित्रा) कामिका
भाद्रपद परिवर्तिनी (पार्श्व) अजा
आश्विन पापांकुशा इंदिरा
कार्तिक प्रबोधिनी (देवउठनी) रमा
मार्गशीर्ष मोक्षदा उत्पन्ना
पौष पुत्रदा सफला
माघ जया षटतिला
फाल्गुन आमलकी विजया

अधिक मास में पद्मिनी (शुक्ल) और परमा (कृष्ण)। अमांत पंचांग में कृष्ण पक्ष की एकादशी पिछले महीने के नाम से लिखी जाती है; एकादशी वही रहती है, बस महीने का नाम बदलता है।

शास्त्र (धर्मसिंधु): ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को ग्रंथ निर्जला कहता है। पर बिना पानी का व्रत सबके लिए सही नहीं; नीचे सेहत वाला हिस्सा देखें।

व्रत और पारण

परंपरा: एकादशी पर अन्न, खासकर चावल, नहीं खाया जाता; फल, दूध, मेवे, साबूदाना, सिंघाड़ा या कुट्टू जैसा फलाहार लिया जाता है। कई लोग एक समय फलाहार करते हैं, कुछ केवल फल-दूध। शाम को विष्णु-पूजा, दीया, तुलसी, और ‘ॐ नमो नारायणाय’ या विष्णु सहस्रनाम।

शास्त्र (धर्मसिंधु): व्रत का पारण (व्रत खोलना) अगले दिन द्वादशी में ही करना चाहिए। अगर द्वादशी लंबी हो, तो उसके पहले चौथाई हिस्से (‘हरिवासर’) के बाद पारण किया जाता है। पारण का ठीक समय शहर के सूर्योदय पर निर्भर है, इसलिए पंचांग में देखें। तुलसी-दल के साथ सादा भोजन से पारण की रीति है।

सेहत: व्रत के हल्के रूप ग्रंथ में ही

उपवास और सेहत: उपवास अपनी सेहत के हिसाब से रखें। डायबिटीज़, ब्लड प्रेशर, गर्भावस्था, स्तनपान, बुज़ुर्ग उम्र, तबीयत ठीक न हो या नियमित दवा चलती हो, तो फल, दूध या एक समय के सादे भोजन वाला हल्का रूप चुनें, या पहले डॉक्टर से पूछ लें। दवा का समय न बदलें। सेहत के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा है; कोई व्रत इसकी जगह नहीं लेता।

शास्त्र (धर्मसिंधु): ग्रंथ खुद कहता है कि जो पूरा उपवास न कर सकें, वे केवल जल, केवल दूध, फलाहार, या रात को एक बार भोजन (नक्त) का संकल्प अपनी शक्ति के अनुसार लें। और ग्रंथ एकादशी व्रत की उम्र आठ से अस्सी वर्ष तक बताता है; यानी छोटे बच्चों के लिए यह व्रत है ही नहीं।

निर्जला (बिना पानी) व्रत सबके लिए सही नहीं; डायबिटीज़ में शुगर गिर सकती है, गर्मी में पानी की कमी हो सकती है, और गर्भावस्था में यह नुकसान कर सकता है। ऐसे में पानी, फल या दूध वाला रूप ही चुनें। चक्कर, घबराहट या कमज़ोरी लगे तो व्रत खोल दें। महीने में दो बार व्रत हो, तो बीच के दिनों में संतुलित भोजन और पानी का ध्यान रखें।

ePandit में

ePandit में: एकादशी का दिन हमारा कैलेंडर आपके शहर के सूर्योदय-सूर्यास्त से दिखाता है। दिन एक बार उज्जैन के हिसाब से तय होता है; जब स्मार्त और वैष्णव दिन अलग हों, तो दोनों अलग-अलग दिखते हैं। हम अभी मुहूर्त नहीं निकालते, और किसी व्रत को किसी के लिए अच्छा या बुरा नहीं बताते।

उपवास अपनी सेहत के हिसाब से रखें। डायबिटीज़, गर्भावस्था, बुज़ुर्ग या नियमित दवा लेने वाले लोग फल, दूध या एक समय के भोजन वाला हल्का रूप चुन सकते हैं; सेहत के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

एक ही एकादशी की दो तारीखें क्यों दिखती हैं?

धर्मसिंधु स्मार्त और वैष्णव के लिए अलग नियम देता है: स्मार्त सूर्योदय पर दशमी देखते हैं, वैष्णव अरुणोदय (सूर्योदय से लगभग 96 मिनट पहले) पर। इसलिए कभी वैष्णव दिन एक दिन बाद आता है।

मैं कौन-सी मानूँ?

अपने परिवार की परंपरा। दीक्षित वैष्णव आमतौर पर वैष्णव दिन रखते हैं। धर्मसिंधु भी परंपरा से चली पहचान को ही मानता है।

पारण कब करें?

अगले दिन द्वादशी के भीतर; द्वादशी लंबी हो तो उसके पहले चौथाई हिस्से के बाद। ठीक समय पंचांग में देखें।

क्या निर्जला ही रखना है?

नहीं। धर्मसिंधु खुद जल, दूध, फल या रात के एक भोजन वाले रूप देता है। तबीयत ठीक न हो, गर्भावस्था, डायबिटीज़ या दवा हो तो हल्का रूप चुनें या डॉक्टर से पूछें।

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