देवशयनी एकादशी: चातुर्मास की शुरुआत
देवशयनी एकादशी आषाढ़ शुक्ल एकादशी है। परंपरा मानती है कि इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा में जाते हैं, और यहीं से चातुर्मास शुरू होता है, जो कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी) पर पूरा होता है। धर्मसिंधु कहता है कि स्मार्त और वैष्णव अपनी-अपनी एकादशी के दिन यह व्रत शुरू करें, इसलिए कुछ सालों में दो दिन दिखते हैं।
चातुर्मास का आरंभ: परंपरा मानती है कि भगवान विष्णु चार महीने योगनिद्रा में जाते हैं।
देवशयनी एकादशी क्या है
आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी, हरिशयनी, पद्मा या आषाढ़ी एकादशी कहते हैं। परंपरा मानती है कि इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में जाते हैं, और चार महीने बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी या प्रबोधिनी) को जागते हैं। इन चार महीनों को चातुर्मास कहते हैं।
साल की 24 एकादशियों में यह सबसे प्रसिद्ध एकादशियों में से एक है। एकादशी के सामान्य नियम, पारण और स्मार्त-वैष्णव अंतर हमारे एकादशी पेज पर विस्तार से हैं; यह पेज इस एक एकादशी की बात करता है।
तारीख कैसे तय होती है
शास्त्र (धर्मसिंधु): इस शयन-व्रत के बारे में ग्रंथ कहता है कि स्मार्त और वैष्णव अपनी-अपनी एकादशी के दिन इसे शुरू करें। यानी दिन वही होगा जो एकादशी का सामान्य नियम हर परंपरा के लिए देता है:
- स्मार्त: सूर्योदय पर दशमी का स्पर्श देखा जाता है।
- वैष्णव: अरुणोदय (सूर्योदय से लगभग 96 मिनट पहले) पर दशमी का स्पर्श देखा जाता है।
ज़्यादातर सालों में दोनों एक ही दिन आते हैं; कभी-कभी वैष्णव एकादशी एक दिन बाद होती है। तब हमारा कैलेंडर दोनों दिन अलग-अलग दिखाता है। कौन-सा मानें, यह अपने परिवार की परंपरा पर है; कोई एक गलत नहीं।
पारण अगले दिन द्वादशी में होता है। धर्मसिंधु आषाढ़ की इस द्वादशी के पारण के लिए अनुराधा नक्षत्र के योग से बचने की बात भी करता है; पारण का ठीक समय पंचांग में देखें।
ग्रंथ में शयनोत्सव
शास्त्र (धर्मसिंधु): इस एकादशी को विष्णु-शयनोत्सव होता है: सजी हुई शय्या पर सोई हुई विष्णु-प्रतिमा, शंख-चक्र आदि चारों आयुधों के साथ, जिनके चरण लक्ष्मी दबा रही हों, उनकी पूजा की जाती है। प्रार्थना का भाव यह है: ‘हे जगन्नाथ, आपके सोने से यह जगत सो जाता है, और आपके जागने से सारा चर-अचर जगत जागता है।’ फिर उपवास, जागरण, द्वादशी को फिर पूजा और त्रयोदशी को गीत-संगीत: इस तरह यह तीन दिन का व्रत है।
धर्मसिंधु यह भी मानता है कि कुछ लोग शयन और जागरण के दोनों उत्सव द्वादशी को पारण के दिन करते हैं, और कहता है कि यहाँ देशाचार (क्षेत्र की रीति) से व्यवस्था समझनी चाहिए। यानी अलग-अलग जगह अलग रीति होना ग्रंथ में ही स्वीकार है।
चातुर्मास: चार महीने के नियम
शास्त्र (धर्मसिंधु): चातुर्मास के संकल्प में एक प्रसिद्ध नियम है: श्रावण में शाक, भाद्रपद में दही, आश्विन में दूध और कार्तिक में द्विदल (दालें) छोड़ना। ये नियम अपनी इच्छा और सामर्थ्य से लिए जाते हैं; बहुत लोग इनमें से एक छोटा नियम चुनते हैं, जैसे किसी एक चीज़ को छोड़ना, रोज़ कुछ पाठ, या एक समय भोजन।
मुहूर्त-चिंतामणि ‘हरिशयन’ का समय आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक बताता है, और इसमें कर्णवेध जैसे कुछ संस्कार टालने की बात करता है। परंपरा इन महीनों में विवाह भी आमतौर पर नहीं रखती; यह किसी डर की बात नहीं, बल्कि बरसात के समय को साधना और घर-परिवार में रहने का समय मानने की रीति है। संन्यासी भी इन महीनों में एक जगह रुकते हैं, और जैन व बौद्ध परंपराओं में भी वर्षा-काल का ऐसा ही ठहराव है।
परिवार कैसे मनाते हैं
महाराष्ट्र: आषाढ़ी एकादशी पंढरपुर के विट्ठल-रुक्मिणी का सबसे बड़ा दिन है। लाखों वारकरी हफ़्तों पैदल चलकर, अभंग गाते हुए, संत ज्ञानेश्वर और संत तुकाराम की पालकियों के साथ पंढरपुर पहुँचते हैं; इसे वारी कहते हैं। उत्तर भारत: मंदिरों में भगवान का शयन-शृंगार, घरों में व्रत या फलाहार और विष्णु सहस्रनाम। ओडिशा: जगन्नाथ रथयात्रा के बाद भगवान की वापसी के आस-पास के दिन। गुजरात और राजस्थान: कई जगह इसी दिन से चातुर्मास की कथाएँ शुरू होती हैं।
सरल पूजा
- सुबह स्नान; विष्णु या विट्ठल का चित्र, तुलसी के पत्ते।
- दीया, फूल, चंदन; ‘ॐ नमो नारायणाय’ या ‘विट्ठल-विट्ठल’ का जप, जो परिवार की रीति हो।
- शाम को चित्र या छोटी प्रतिमा को एक छोटे आसन पर आराम से रखने की रीति: भगवान के विश्राम का प्रतीक।
- व्रत या फलाहार, अपनी सेहत के हिसाब से।
- अगले दिन द्वादशी में पारण; चाहें तो चातुर्मास का कोई छोटा नियम ले लें।
कोई पैसे वाली पूजा ज़रूरी नहीं।
सेहत और सुरक्षा
उपवास और सेहत: उपवास अपनी सेहत के हिसाब से रखें। डायबिटीज़, ब्लड प्रेशर, गर्भावस्था, स्तनपान, बुज़ुर्ग उम्र, तबीयत ठीक न हो या नियमित दवा चलती हो, तो फल, दूध या एक समय के सादे भोजन वाला हल्का रूप चुनें, या पहले डॉक्टर से पूछ लें। दवा का समय न बदलें। सेहत के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा है; कोई व्रत इसकी जगह नहीं लेता। निर्जला व्रत की ज़रूरत नहीं; धर्मसिंधु खुद असमर्थ लोगों के लिए जल, दूध या फल वाले रूप बताता है (देखें एकादशी पेज)।
चातुर्मास के भोजन-नियम भी सेहत देखकर ही लें; डॉक्टर ने दूध, दही या दाल बताई हो तो वही मानें। वारी जैसी लंबी पैदल यात्रा में पानी, छाता, आरामदायक चप्पल और आराम ज़रूरी है; बरसात में फिसलन और भीड़ से सावधान रहें।
ePandit में
ePandit में: त्योहार का दिन हमारा कैलेंडर आपके शहर के सूर्योदय-सूर्यास्त से दिखाता है। दिन एक बार उज्जैन के हिसाब से तय होता है, आपके शहर का समय अलग दिखता है। हम अभी मुहूर्त नहीं निकालते, और किसी त्योहार को किसी के लिए अच्छा या बुरा नहीं बताते।
उपवास अपनी सेहत के हिसाब से रखें। डायबिटीज़, गर्भावस्था, बुज़ुर्ग या नियमित दवा लेने वाले लोग फल, दूध या एक समय के भोजन वाला हल्का रूप चुन सकते हैं; सेहत के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा। वारी जैसी लंबी पैदल यात्रा में पानी, छाता और आराम।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
कभी दो तारीखें क्यों दिखती हैं?
धर्मसिंधु कहता है कि स्मार्त और वैष्णव अपनी-अपनी एकादशी के दिन यह व्रत शुरू करें। दोनों के नियम अलग हैं, इसलिए कुछ सालों में वैष्णव दिन एक दिन बाद आता है।
चातुर्मास में क्या बदलता है?
परंपरा में कई लोग कोई छोटा भोजन-नियम या पाठ का नियम लेते हैं, और विवाह आमतौर पर नहीं रखे जाते। नियम अपनी इच्छा और सेहत से लें।
चातुर्मास कब पूरा होता है?
कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी या प्रबोधिनी एकादशी) पर, जब परंपरा भगवान के जागने का उत्सव मनाती है।
व्रत न रख सकें तो?
पूजा, दीया और नाम-स्मरण भी परंपरा का हिस्सा है। तबीयत ठीक न हो, गर्भावस्था, डायबिटीज़ या दवा हो तो हल्का रूप चुनें या डॉक्टर से पूछें।
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