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देवउठनी एकादशी: भगवान के जागने का उत्सव

देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी कार्तिक शुक्ल एकादशी है। परंपरा मानती है कि आषाढ़ की देवशयनी एकादशी से सोए भगवान विष्णु इस दिन जागते हैं और चातुर्मास पूरा होता है। व्रत का दिन स्मार्त और वैष्णव एकादशी के अपने-अपने नियम से तय होता है; धर्मसिंधु के अनुसार जगाने का उत्सव (प्रबोधोत्सव) द्वादशी को, पारण के दिन, रात के पहले हिस्से में करने का देशाचार है।

चातुर्मास का अंत: परंपरा मानती है कि भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं; विवाह-सीज़न इसके बाद।

देवउठनी एकादशी क्या है

आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी) से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक के लगभग चार महीने चातुर्मास कहलाते हैं। परंपरा मानती है कि इस समय भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर योगनिद्रा में रहते हैं, और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं। इसलिए इस दिन के नाम हैं देवउठनी, देवोत्थान या प्रबोधिनी एकादशी।

उत्तर भारत में यह घर-आँगन का उत्सव है, महाराष्ट्र में कार्तिकी एकादशी पर पंढरपुर की यात्रा होती है, और कई जगह इसी के आसपास तुलसी विवाह होता है। परंपरा में विवाह आदि का मौसम इसके बाद खुलता माना जाता है।

दिन कैसे तय होता है

व्रत का दिन: यह हर एकादशी जैसा है। शास्त्र (धर्मसिंधु): स्मार्त उस एकादशी को छोड़ते हैं जिसमें सूर्योदय पर दशमी का स्पर्श हो, और वैष्णव अरुणोदय (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पहले) पर दशमी के स्पर्श को भी छोड़ते हैं। इसलिए कुछ सालों में स्मार्त और वैष्णव एकादशी अलग-अलग दिन पड़ती हैं; हमारा कैलेंडर दोनों दिखाता है, और एक ही दिन हो तो एक।

जगाने का उत्सव: शास्त्र (धर्मसिंधु): प्रबोधोत्सव कहीं कार्तिक शुक्ल एकादशी को बताया गया है और रामार्चनचंद्रिका आदि में द्वादशी को। ग्रंथ कहता है कि उठाने के मंत्र में द्वादशी का नाम है, इसलिए द्वादशी ठीक है, और देशाचार यह है कि पारण के दिन रात के पहले हिस्से में उत्सव हो।

पारण: शास्त्र (धर्मसिंधु): कार्तिक शुक्ल द्वादशी को, रेवती नक्षत्र के योग से बचकर, पारण करें। बहुत से घरों में जगाने की पूजा एकादशी की शाम को ही होती है; यह भी प्रचलित रीति है।

कथा: परंपरा / पुराण कथा

परंपरा में भगवान विष्णु चार महीने के विश्राम के बाद जागते हैं, और उनके जागने के साथ धरती पर मंगल कामों का समय फिर शुरू होता है। धर्मसिंधु जगाने की प्रार्थना का भाव यों देता है: हे गोविंद, आप उठिए, नींद छोड़िए; आपके सोने पर जगत सोता है और आपके उठने पर उठता है। साथ में शरद के फूल अर्पित करने की बात है: बादल चले गए, आकाश और दिशाएँ निर्मल हुईं।

चातुर्मास के व्रत (किसी खाने की चीज़ को छोड़ना आदि) इसी समय पूरे किए जाते हैं। धर्मसिंधु बताता है कि कुछ लोग चातुर्मास व्रत की समाप्ति इसी द्वादशी को मानते हैं, और कुछ चतुर्दशी या पूर्णिमा को।

परिवार कैसे मनाते हैं

उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश के कई घरों में आँगन में गेरू और चावल के आटे से भगवान के चरण और चौक बनाए जाते हैं। उस पर गन्ना, सिंघाड़ा, बेर, शकरकंद और नई फसल की चीज़ें रखी जाती हैं, ऊपर डलिया ढकी जाती है, और शाम को थाली या घंटी बजाकर गाया जाता है: ‘उठो देव, बैठो देव’।

शास्त्र (धर्मसिंधु): पूजा के बाद घंटा आदि बाजों की आवाज़ से भगवान को जगाने की बात कही गई है।

महाराष्ट्र में कार्तिकी एकादशी पर वारकरी पंढरपुर में विठ्ठल के दर्शन को पहुँचते हैं। गुजरात और महाराष्ट्र में इसके बाद तुलसी विवाह का उत्सव होता है। रीति हर क्षेत्र में अलग है; कोई भी रूप अपनाएँ, भाव एक है।

सरल पूजा

  1. सुबह स्नान, विष्णु या श्रीकृष्ण का स्मरण, और अपनी सेहत के हिसाब से व्रत या फलाहार (नीचे देखें)।
  2. शाम को पूजा-स्थान या आँगन में चौक, दीया, तुलसी के पास भी एक दीया।
  3. गन्ना, मौसमी फल, फूल और तुलसी दल अर्पित करें।
  4. शंख, घंटी या थाली बजाकर ‘उठो देव’ कहते हुए भगवान को जगाने की रीति, फिर आरती।
  5. अगले दिन द्वादशी को पारण: सादा भोजन, और चाहें तो किसी ज़रूरतमंद को भोजन।

कोई पैसे वाली पूजा ज़रूरी नहीं।

सेहत और सुरक्षा

उपवास और सेहत: उपवास अपनी सेहत के हिसाब से रखें। जो लोग बीमार हैं, गर्भवती हैं, जिन्हें डायबिटीज़ है या जो नियमित दवा लेते हैं, वे फल, दूध या एक समय के सादे भोजन वाला हल्का रूप चुन सकते हैं, या पहले डॉक्टर से पूछ लें। दवा का समय न बदलें। सेहत के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा है; कोई व्रत इसकी जगह नहीं लेता।

निर्जला एकादशी (पानी के बिना) हर किसी के लिए नहीं; पानी, फल या दूध वाला रूप भी परंपरा में है, और पूजा, दीया और नाम-स्मरण भी पूरा व्रत-भाव है। चक्कर, घबराहट या कमज़ोरी लगे तो कुछ खा-पी लें और डॉक्टर से बात करें। पारण में बहुत भारी भोजन एक साथ न लें।

दीयों को परदों, कपड़ों और सूखी पत्तियों से दूर रखें, बच्चों के पास बड़ा व्यक्ति रहे, और पास में पानी की बाल्टी रखें।

ePandit में

ePandit में: त्योहार का दिन हमारा कैलेंडर आपके शहर के सूर्योदय-सूर्यास्त से दिखाता है। दिन एक बार उज्जैन के हिसाब से तय होता है, आपके शहर का समय अलग दिखता है। हम अभी मुहूर्त नहीं निकालते, और किसी त्योहार को किसी के लिए अच्छा या बुरा नहीं बताते।

उपवास अपनी सेहत के हिसाब से रखें। डायबिटीज़, गर्भावस्था, बुज़ुर्ग या नियमित दवा लेने वाले लोग फल, दूध या एक समय के भोजन वाला हल्का रूप चुन सकते हैं; सेहत के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कुछ सालों में दो तारीखें क्यों?

स्मार्त और वैष्णव एकादशी के अलग नियम मानते हैं: वैष्णव अरुणोदय पर दशमी के स्पर्श को भी छोड़ते हैं। इसलिए कभी दोनों एक दिन, कभी अलग।

तुलसी विवाह कब?

धर्मसिंधु के अनुसार प्रचलन है कि इसे पारण के दिन, प्रबोधोत्सव के साथ, रात के पहले हिस्से में किया जाए। कई जगह एकादशी की शाम या पूर्णिमा तक भी करते हैं।

व्रत न रख सकें तो?

पूजा, दीया और नाम-स्मरण भी परंपरा का हिस्सा है। सेहत के हिसाब से चुनें; सेहत के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा।

क्या इसके बाद ही विवाह होते हैं?

परंपरा में विवाह का मौसम देवउठनी के बाद शुरू माना जाता है। किसी खास तारीख का मुहूर्त हम अभी नहीं निकालते।

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आधार: धर्मसिंधु, प्रबोधोत्सव (कार्तिक शुक्ल एकादशी / द्वादशी), कहीं एकादशी, रामार्चनचंद्रिका आदि में द्वादशी · धर्मसिंधु, प्रबोधोत्सव का देशाचार, पारण के दिन रात के पहले हिस्से में · धर्मसिंधु, एकादशी-निर्णय (स्मार्त), स्मार्त के लिए विद्धा एकादशी का त्याग · धर्मसिंधु, एकादशी: वैष्णव अरुणोदय-वेध, अरुणोदय पर दशमी का स्पर्श · धर्मसिंधु, कार्तिक द्वादशी का पारण, रेवती के योग से रहित द्वादशी · धर्मसिंधु, भगवान को जगाना, घंटा आदि बाजों की आवाज़ से · धर्मसिंधु, जगाने की प्रार्थना (भाषा-टीका), आपके सोने पर जगत सोता है, उठने पर उठता है · धर्मसिंधु, चातुर्मास व्रत की समाप्ति, कुछ के मत में इसी द्वादशी को · परंपरा, क्षीरसागर में योगनिद्रा; ‘उठो देव’ गीत, गन्ना और डलिया; पंढरपुर की कार्तिकी वारी