अमावस्या: चाँद-रहित रात, शांत स्मरण का दिन
अमावस्या हर महीने कृष्ण पक्ष की आख़िरी तिथि है, जब चाँद सूर्य के बहुत पास होने से दिखाई नहीं देता। धर्मसिंधु स्नान-दान के लिए परली अमावस्या लेने को कहता है, और सोमवार या मंगलवार वाली अमावस्या को स्नान-दान में बड़ी पवित्र मानता है। बहुत से परिवार इस दिन अपनी कुल-रीति से पितरों को याद करते हैं; यह एक शांत, अपनी इच्छा का दिन है, डरने का नहीं।
हर महीने की अमावस्या: पितरों का स्मरण, स्नान और दान।
अमावस्या क्या है
तिथि चाँद और सूर्य के बीच के कोण से बनती है। महीने में एक बार चाँद सूर्य के लगभग साथ आ जाता है; उस समय उसका रोशन हिस्सा हमारी ओर नहीं होता, इसलिए रात में चाँद नहीं दिखता। कृष्ण पक्ष की यही पंद्रहवीं तिथि अमावस्या है। इसके ठीक बाद शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से चाँद फिर बढ़ने लगता है।
अमांत पंचांग (जो महाराष्ट्र, गुजरात, दक्षिण भारत में चलता है) में महीना अमावस्या पर ख़त्म होता है; पूर्णिमांत पंचांग (उत्तर भारत) में महीना पूर्णिमा पर। अमावस्या वही रहती है, बस उसके महीने का नाम दोनों पंचांगों में अलग लिखा मिल सकता है।
चाँद-रहित रात सुनने में भारी लग सकती है, पर परंपरा इसे शांत स्मरण का दिन मानती है: नहाना, कुछ दान, और अपने पूर्वजों को याद करना। इसमें डर की कोई बात नहीं।
तारीख कैसे तय होती है
अमावस्या कभी एक दिन सुबह से अगली सुबह तक चलती है, कभी दो दिनों में बँट जाती है। तब कौन-सा दिन, यह काम पर निर्भर है:
- स्नान और दान (शास्त्र, धर्मसिंधु): पूर्णिमा और अमावस्या, सावित्री-व्रत को छोड़कर, परली ली जाती है, यानी वह दिन जिसके सूर्योदय पर अमावस्या चल रही हो।
- पितरों का तर्पण, दर्श श्राद्ध (परंपरा): आम चलन में वह दिन लिया जाता है जिसके अपराह्न (दोपहर के बाद का हिस्सा) में अमावस्या हो। इसलिए कभी-कभी पंचांग में स्नान-दान और श्राद्ध की अमावस्या अलग-अलग दिन लिखी मिलती है।
- सोमवती अमावस्या (शास्त्र, धर्मसिंधु): धर्मसिंधु कहता है कि सोमवार और मंगलवार वाली अमावस्या स्नान-दान में बड़ी पवित्र है, और सोमवार की अमावस्या को पीपल-पूजा वाला ‘सोमवती’ व्रत किया जाता है।
- दिवाली की अमावस्या: वहाँ लक्ष्मी-पूजा शाम की है, इसलिए प्रदोष (शाम) वाला अलग नियम लगता है; उसके लिए दिवाली का पेज देखें।
मुहूर्त चिंतामणि की टीका तिथियों के स्वामी गिनाते हुए अमावस्या के स्वामी पितर बताती है; अमावस्या और पूर्वजों के स्मरण का रिश्ता यहीं से समझ आता है।
कुछ ख़ास अमावस्याएँ: परंपरा
साल की बारह-तेरह अमावस्याओं में से कुछ के अपने नाम और रीतियाँ हैं, जो अलग-अलग इलाक़ों में अलग हैं:
- मौनी अमावस्या (पूर्णिमांत माघ): बहुत से लोग मौन रखकर स्नान करते हैं; प्रयाग जैसे तीर्थों में बड़ी भीड़ होती है।
- सर्वपितृ अमावस्या (पितृपक्ष का आख़िरी दिन): जिन पूर्वजों की तिथि याद न हो, उन्हें इस दिन याद करने का चलन है।
- हरियाली अमावस्या (पूर्णिमांत श्रावण, उत्तर भारत) और दीप अमावस्या (अमांत आषाढ़, महाराष्ट्र); दोनों पंचांगों में महीने का नाम अलग है: बारिश के मौसम की रीतियाँ, पेड़ लगाना और दीयों की सफ़ाई-पूजा।
- शनि अमावस्या: शनिवार को पड़े तो कुछ लोग शनि-मंदिर जाते हैं।
ये सब जीवित लोक-परंपराएँ हैं; हर परिवार अपनी रीति मानता है, और किसी को मानना ज़रूरी नहीं।
परिवार कैसे मनाते हैं
बहुत से घरों में सुबह नहाकर, अपनी कुल-रीति से, पूर्वजों के नाम से थोड़ा जल और तिल अर्पित किया जाता है (तर्पण)। कुछ परिवार इस दिन ब्राह्मण, गाय या किसी ज़रूरतमंद को भोजन कराते हैं; कुछ बस एक दीया जलाकर अपने दादा-दादी, नाना-नानी को याद कर लेते हैं। नदी-किनारे बसे शहरों में अमावस्या का स्नान एक पुरानी रीति है।
श्राद्ध और तर्पण हर परिवार में एक जैसे नहीं होते: कहीं हर अमावस्या पर, कहीं केवल पितृपक्ष में, कहीं बिल्कुल नहीं। यह अपनी इच्छा और कुल-रीति की बात है; जो न करे, उसके लिए कोई डर या ‘कमी’ की बात नहीं।
सरल पूजा
घर पर एक सरल रूप, जितना मन और समय हो:
- सुबह स्नान। चाहें तो पानी में थोड़े तिल।
- अपनी कुल-रीति हो तो पूर्वजों के नाम से जल और तिल अर्पित करें; न हो तो बस शांत बैठकर उन्हें याद करें।
- अपनी सामर्थ्य से दान: अन्न, कपड़ा, या किसी ज़रूरतमंद को भोजन। गाय या पक्षियों को दाना भी पुरानी रीति है।
- सोमवती अमावस्या पर बहुत सी महिलाएँ पीपल की पूजा और परिक्रमा करती हैं।
- शाम को घर में या पीपल के पास एक दीया।
परंपरा मानती है कि ऐसे स्मरण से मन को सहारा और कृतज्ञता का भाव मिलता है; इसके साथ कोई वादा या शर्त नहीं जुड़ी।
सुरक्षा और सेहत
नदी-स्नान: किनारे पर ही नहाएँ, गहरे पानी और तेज़ बहाव से दूर रहें। मौनी या सोमवती अमावस्या पर घाटों पर बहुत भीड़ होती है; बच्चों और बुज़ुर्गों का हाथ थामें। ठंड में गुनगुने पानी से घर पर स्नान भी पूरा माना जाता है।
दीये: दीयों को परदों और कपड़ों से दूर रखें, बच्चों के पास कोई बड़ा व्यक्ति रहे, और पास में पानी या रेत की बाल्टी रखें।
उपवास: कुछ लोग अमावस्या पर व्रत रखते हैं। जिनकी तबीयत ठीक न हो, गर्भवती महिलाएँ, डायबिटीज़ वाले या नियमित दवा लेने वाले लोग हल्का रूप (फल, दूध या एक समय का सादा भोजन) चुनें या डॉक्टर से पूछ लें। निर्जला व्रत की कोई ज़रूरत नहीं। सेहत के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा है; कोई व्रत इसकी जगह नहीं लेता।
ePandit में
ePandit में: त्योहार का दिन हमारा कैलेंडर आपके शहर के सूर्योदय-सूर्यास्त से दिखाता है। दिन एक बार उज्जैन के हिसाब से तय होता है, आपके शहर का समय अलग दिखता है। हम अभी मुहूर्त नहीं निकालते, और किसी त्योहार को किसी के लिए अच्छा या बुरा नहीं बताते।
नदी-स्नान में गहरे पानी से दूर; दीयों को परदों और कपड़ों से दूर रखें, बच्चों के पास बड़ा व्यक्ति रहे, और पास में पानी या रेत की बाल्टी रखें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या अमावस्या डरने का दिन है?
नहीं। चाँद का न दिखना बस आकाश की एक नियमित स्थिति है। परंपरा इसे पितरों के स्मरण, स्नान और दान का शांत दिन मानती है।
सोमवती अमावस्या क्या है?
जो अमावस्या सोमवार को पड़े। धर्मसिंधु सोमवार और मंगलवार वाली अमावस्या को स्नान-दान में बड़ी पवित्र कहता है, और सोमवती पर पीपल-पूजा की रीति बताता है।
पंचांग में दो दिन अमावस्या क्यों दिखती है?
तिथि सूर्योदय से सूर्योदय तक नहीं चलती, इसलिए कभी दो दिनों में बँट जाती है। स्नान-दान के लिए धर्मसिंधु परली लेता है; तर्पण के लिए परंपरा अपराह्न देखती है।
क्या हर अमावस्या पर श्राद्ध करना ज़रूरी है?
यह कुल-रीति पर है। बहुत से परिवार केवल पितृपक्ष में श्राद्ध करते हैं, कुछ हर अमावस्या पर बस याद कर लेते हैं। जो आपके परिवार में चलता है, वही ठीक है।
दिवाली की अमावस्या का नियम अलग क्यों?
दिवाली की मुख्य पूजा शाम की है, इसलिए वहाँ वह अमावस्या ली जाती है जो प्रदोष (शाम) में हो।
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